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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



विगत को तू बिसरा दे


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
विगत को तू बिसरा दे,
वर्तमान अपना ले,
जाने कौन घड़ी तेरा
जीवन तुझको ठुकरा दे ।
 
यादें तो तब तक ही हैं,
जब तक साँस चले तेरी,
साँसों के चलते-चलते,
यादें नई बना ले।
 
कौन मरे तेरी खातिर,
कौन जिये तेरी खातिर,
ये पल ही है तेरा अपना,
क्यों न इसे भुला ले।
 
दर्द सभी को मिलता है,
कोई गिरता, कोई चलता है,
आगे वही निकलता है,
जो दर्द से नाता तुड़ा ले।

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