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वर्ष: 1, अंक17, जुलाई(द्वितीय), 2017



यूँ ही सहन करता जाऊं!!


डॉ० अनिल चड्डा


 		 
फिर 
अंदर से 
एक आवाज आई 
लगता है 
फिर कुछ टूटा
मेरी आकांक्षा 
या 
मेरी आशा 
या 
विश्वास 
या फिर 
एक और सपना 
कुछ स्पष्ट नहीं
हो भी कैसे सकता है 
प्रतिदिन ही तो
कोई नई घटना होती है 
कोई नया अवसाद मिलता है 
और टूटता रहता हूँ 
अंदर ही अंदर 
दम घुटने लगता है 
सहन करते-करते 
फिर सोचता हूँ
गर यही आम फितरत है
तो मैं भी 
क्यों न बदल जाऊं
इन सबसे निजात पा जाऊं
या तो आँख, कान, मन के 
दरवाजे बंद कर लूँ 
या यूँ ही सहन करता जाऊं!
यूँ ही सहन करता जाऊं!!

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