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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

आरंभ चैरिटेबल फाउंडेशन द्वारा स्वराज संचालनालय ,संस्कृति विभाग
भोपाल में व्यंग्य सत्र "अहा! सब चलता है " का आयोजन

अनुपमा श्री

आरंभ चैरिटेबल फाउंडेशन द्वारा स्वराज संचालनालय ,संस्कृति विभाग भोपाल में व्यंग्य सत्र "अहा! सब चलता है " का आयोजन 19/06/19 को किया गया ,जिसमें प्रमुख व्यंग्यकारोँ ने भाग लिया । कार्यक्रम की अध्यक्षता घनश्याम सक्सेना ने की ,वहीं मुख्य अतिथि प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ हरि जोशी जी थे।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि साधना बलबटे थीं।" यह सब चलता है" क्या फर्क पड़ता है " जैसा नकारात्मक एटीट्यूड जो हर कहीं ,हर क्षेत्र में एक लापरवाही, अदूरदर्शिता, गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और असंवेदनशीलता दिखाता है।

जब हमसे अपने कर्तव्य की पूर्ति नहीं होती, कोई अच्छा कर्म नहीं होता और कोई गलत काम होता है तो भी हम तुरंत कह देते हैं कि अरे, यह तो चलता है जो कि एक बहुत गलत दृष्टिकोण है। आज इस कार्यक्रम में व्यंग्यकारों ने समाज के उन सभी सम सामयिक गंभीर मुद्दे, विसंगतियों, विद्रूपताओं ,पाखंड अन्याय ,शोषण ,अत्याचार, लापरवाही,अफसरशाही पर अपनी कलम की धार तेज की और व्यंगात्मक शैली में कटाक्ष करते हुए अपने अपने व्यंग्य प्रस्तुत किए कि " सब नहीं चलता है और नहीं चलना चाहिए "। हमें इस गलत एटीट्यूड को बदलने की जरूरत है।

वही चलना चाहिए जो सटीक है, सत्य है और उचित है। जो समाज को सकारात्मक दिशा में ले जाए और मानवीय मूल्यों की स्थापना हो।

शोभा ठाकुर ने अपने व्यंग्य में सड़कों पर जिस तरह मवेशी चलते हैं पर जोरदार कटाक्ष किया और कहा कि यहां सड़कों पर बैठे हुए गौ माता और जानवर बैठे रहते हैं और हम गुजरने वालों से कुछ इस तरह से कहते हैं कि "तू हमें क्या उठाएगा यहां से हमें तो कोई जिम्मेदार प्राणी भी यहां से नहीं उठा पाया " यहां तो हमारा ही बहुमत है।

आरंभ फाउंडेशन की अध्यक्ष अनुपमा अनुश्री ने अपनी व्यंग्य रचनाओं , व्यंगिकाओं से बढ़ते दुष्कर्म -घटते नैतिक मूल्य, छद्म आधुनिकता, मोबाइल संस्कृति, जिम्मेदारों के खाने के दांत और दिखाने के और सहित कई विसंगतियों पर प्रहार किया और व्यंगात्मक शैली में भाषाई तेवर से अपना आक्रोश दिखाते हुए कहा " ये मान वेतर, जानवर से बदतर दुष्कर्मी घूमते हैं छाती चौड़ी कर, जैसे जानते हैं, कि भारत है यहां कौन डरता है। यहां तो सब चलता है।

सब दुष्कर्मी हैवान, बेखौफ ,बेधड़क ,खुली हवा में झूम रहे हैं और इन्हें दंड देने वाली फाइलें न्यायालयों में घूम रही हैं ।

चप्पे-चप्पे पर उपस्थित साहित्यकारों पर तथाकथित साहित्यकारों पर तंज करते हुए कहा कि भारत में जैसे साहित्यकारों की फैक्ट्री लगी है, जो यह कहते हैं क्वालिटी में हम में दम नहीं ,लेकिन क्वांटिटी में हम कम नहीं! तो क्या विदेशों में पैन नहीं बनते या वहां लेखक ने जन्मते!

जहां से सब नीति नियम विधान निकलते हैं जनता पर लागू होने के लिए वहीं ऑफिसों में कुछ इस तरह के हाल चलते हैं ।चाय की चुस्कियां लेने चल पड़ी शर्मा जी की टोली, लंच में छोड़कर कूलर पंखे ट्यूबलाइट खुली। भजते हुए" होई है वही जो राम रचि राखा"।

अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता है और इन हैवानों ने नन्हीं - मुन्नियों के सांस लेने का हक़ किस हक से इस बर्बरता से छीन लिया है! इन नराधमों का अंग भंग करके, नपुंसक कर देना ही एक उपाय बचता है क्योंकि सच में "सब कुछ नहीं चलता है" ।

डॉ मीनू पांडे ने बिकते सम्मानों पर कटाक्ष करते हुए अपनी क्षणिका में कहा अजब का शौक रखते हैं इस बस्ती के लोग सम्मान की खरीद- फरोख्त। पहले खरीदो फिर बेचो। तेरा भी फायदा , मेरा भी फायदा । फिर क्या कायदा! सब चलता है !

मनोज देशमुख ने सामाजिक दोगलेपन पर और बिंदु त्रिपाठी ने अपने व्यंग्यालेख में ट्रैफिक पुलिस, इधर उधर थूकना, पानी की बर्बादी, मीटू, गैर कानूनी कार्य, जैसे गलत कार्य सब चलता है की आड़ मे व्यंग्य के जरिए उजागर किए ।

किस तरह आजकल हॉस्पिटल आला दर्ज़े के लूट के केंद्र बन गए हैं और स्वस्थ व्यक्ति को भी मरीज किए दे रहे हैं इस पर बढ़िया तंज कसा डॉ अरविंद जैन ने अपने व्यंग्य में।

शेफालिका जी ने अपने व्यंग्य में एक इंसान की जगह एक कुत्ते की किस तरह से इज्जत, देखभाल की जाती है उस पर बढ़िया तंज कसा। वहीं श्यामा गुप्ता ने आज की राजनीति पर कुर्सी की कहानी से अच्छा तंज करके गुदगुदाया।

हमें हटकर ही कुछ कहना है, लोगों के दिलों तक पहुँचे , तभी वह व्यंग्य सार्थक है।....विशिष्ट अतिथि डॉ साधना बलबटे ।

मुख्य रूप से व्यंग्य कथनी और करनी के भेद को दिखाता है । व्यंग्यकार अपने शब्द प्रहार से ,तंज से ,कटाक्ष से यही वार करता है। देश कुछ नियम कायदों से चले तो ठीक हो क्यूँकि सब कुछ नहीं चलता है। ....प्रोफेसर हरि जोशी

विविध विषयों पर अहा! सब चलता है एक विविधा प्रस्तुति थी जिसमें उन सभी विषयों पर प्रहार किया गया जो काफी गंभीर और अनछुए भी थे। व्यंग्य की यही सफलता है कि तमाम विसंगतियों को ढूढ़ कर उन्हें प्रकाश में लाया जाए ताकि समाज की दिशा और दशा में सकारात्मक परिवर्तन हो।....घनश्याम सक्सेना

स्मृति कानूगो ,अशोक व्यास ,मधुलिका सक्सेना ,राजकुमारी चौकसे ,अर्चना मुखर्जी सहित बड़ी संख्या में व्यंग्यकार और श्रोता उपस्थित थे।


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