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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

पुस्तक समीक्षा-
साक्षात्कार संग्रहः साहित्यकारों और लोक कलाकारों दगड़ि बातचीत

डा. बंदना चंद

पवनेश ठकुराठी ‘पवन’ कुमाउनी और हिंदी के सक्रिय रचनाकार हैं। उनका वर्ष 2016 में प्रकाशित संग्रह साहित्यकारों और लोककलाकारों दगड़ि बातचीत कुमाउनी का पहला साक्षात्कार संग्रह है। इस साक्षात्कार संग्रह में कुल 10 साक्षात्कार संगृहीत हैं। इनमें से 5 साक्षात्कार लेखक ने साहित्यकारों के लिए हैं और 5 साक्षात्कार लोककलाकारों के । पुस्तक में दो भागों में संगृहीत ये साक्षात्कार क्रमशः कुमाउनी भाषा और साहित्यक भविष्य उज्ज्वल छु-डा. हयात सिंह रावत, लेखन में कुमाउनीक लुप्त हुण लागि रईं शब्दोंक प्रयोग करन चैं-त्रिभुवन गिरि, नानतिनों में वैज्ञानिक सोच पैद करनी वाल बाल साहित्य लिखी जाण चैं-उदय किरौला, यो दौर कुमाउनी भाषाक स्वर्ण काल छु-श्याम सिंह कुटौला, कुमाउनी में सरल भाषा-शैली में लोकोपयोगी और रुचिकर साहित्य लिखी जाण चैं-महेंद्र ठकुराठी, लोकगीत यस हुण चैं जो स्रोताकि आत्मा पर असर करौ-दीवान कनवाल, अगर मैं छ्यौड़ हुनींत और जादे काम करनीं-माहेश्वरी बिष्ट, मैं एक लोकसंगीतक इस्कूल खोलण चां-सुरेश प्रसाद ‘सुरीला’, लोक कलाकारोंकि पेंशन राशि जादे हुन चैं-कबूतरी देवी और गीत कुमाउनी भाषा कें अघिल बढ़ूनाक भौत ठुला माध्यम छन-प्रहलाद मेहरा हैं।

पहले साक्षात्कार में लेखक ने कुमाउनी मासिक पत्रिका ’पहरू’ के संपादक डा. हयात सिंह रावत से बातचीत की है। इस साक्षात्कार में डा. हयात सिंह रावत कुमाउनी भाषा के उज्जवल भविष्य के प्रति आशावान दिखाई दिए हैं: ‘‘हम समझनूं कि कुमाउनी भाषा और साहित्यक भविष्य उज्ज्वल छु। जो भाषा में 600 लोग लेखनर्इं, रचनाकार छन वी भाषाक भविष्य त उज्ज्वलै कई जै सकूं। और हम यो माननू कि करीब-करीब 50000 लोग पुर देश में पहरू पढ़नई।‘‘ दूसरे साक्षात्कार में लेखक ने कुमाउनी और हिंदी भाषा के रचनाकार त्रिभुवन गिरि से बातचीत की है। त्रिभुवन गिरि मानते हैं कि साहित्य में कुमाउनी के लुप्त हो रहे शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग किया जाना चाहिएः ‘‘कुमाउनीक युवा रचनाकारों थें म्यर यो कूंन छु कि उनूंकें कुमाउनी विलुप्त हुण लागि रई शब्दोंक इस्तेमाल लेखन में करन चैं। जसिकै ‘कल्याण’ में एक शब्द ऐरौ मकुड़। मकुड़ यानी मकड़ी। तसिकै तमाम शब्द छन जो प्रयोग में नै ऊँनई। जब क्वे चीज प्रयोग में नै ऊंनि त उ विलुप्त है जांछि।‘‘

तीसरा साक्षात्कार लेखक ने बालप्रहरी और ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के संपादक उदय किरौला का लिया है। श्री उदय किरौला का मानना है कि बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने वाला साहित्य लिखा जाना चाहिए। इसी तरह चैथे और पांचवे साक्षात्कार भी लेखक ने कुमाउनी साहित्यकार श्यामसिंह कुटौला और महेंद्र ठकुराठी के लिए हैं।

छठा साक्षात्कार लेखक ने कुमाउनी लोककलाकार दीवान कनवाल का लिया है। दीवान कनवाल का मानना है कि लोकगीत ऐसा होना चाहिए जो श्रोता की आत्मा पर प्रभाव डाले: ‘‘आधुनिक गीतों में प्रेमक स्तर भौत हल्क रूप में द्यखींछ। औरत और मर्दक बीच में प्रेमी-प्रेमिकाक रुप सही हुन चैं। कूंणाक मतलब यो छु कि गीतक आपण के मुखड़त हुनै चैं। वीकि आपणि आत्मा हुन चैं। विषय हुण चैं। लोकगीत उ भल हुंछ जो श्रोताओंक शरीर कें नै बलकन वीक मन कें नचाओ।‘‘ इसी तरह लेखक ने सातवां साक्षात्कार लेखक ने कुमाउनी लोक गायिका माहेश्वरी बिष्ट का, आठवां साक्षात्कार लोकगायक सुरेश प्रसाद ‘सुरीला‘ का और नौवां साक्षात्कार लोकगायिका कबूतरी देवी का लिया है। दसवां और पुस्तक का अंतिम साक्षात्कार लेखक ने लोकगायक प्रहलाद मेहरा का लिया है। प्रहलाद मेहरा लोकगीतों को भाषा को आगे बढ़ाने का माध्यम मानते हैं: ‘‘गीत कुमाउनी भाषा कें अघिल बढ़ूनाक भौत ठुल माध्यम छन। गीतोंक माध्यमल भाषाक विकास हुंछ, लेकिन आजकला जो गीतकार छन, उनूकें भाषा मालूम न्हें। येक लिजी कुमाउनी भाषाक एक शब्दकोश, डिक्शनरी टाइपकि बणाई जांण चैं।‘‘

पुस्तक के सभी साक्षात्कार लेखक ने स्वयं लिए हैं । इन साक्षात्कारों के माध्यम से लेखक ने साहित्यकारों और कलाकारों के जीवन, रचनाकर्म और कलाकर्म से जुड़े कई नवीन और महत्वपूर्ण तथ्य उद्घाटित किए हैं । कुल मिलाकर लेखक पवनेश ठकुराठी ‘पवन’ द्वारा लिखी यह पुस्तक उपयोगी और पठनीय तो है ही साथ ही कुमाउनी साक्षात्कार की पहली पुस्तक होने के कारण कुमाउनी साक्षात्कार साहित्य की बीज पुस्तक भी है।


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