मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

पुस्तक समीक्षा :
धारदार व्यंग्य से लबालब उपन्यास 'बिसात'

डॉ० घनश्याम बादल

व्यंग्यकार कवि और लेखक नेमपाल प्रजापति का उपन्यास 'बिसात' उनके अंदर छिपे मौलिक व्यंग्यकार से पूरी तरह प्रभावित 160 पृष्ठों का एक प्रवाहमयी एवं हल्की-फुल्की भाषा में सरल तरीके से लिखा गया ऐसा उपन्यास है जिसे पढ़ना शुरू करके बीच में छोड़ना मुश्किल लगता है ।

इस उपन्यास की शुरुआत लेखक बड़े ही रोचक तरीके से उस उहापोह के साथ शुरू करता है जो हर रचनाकार मेंउस वक्त होती है जब वह कुछ नया करने की सोचता है । उपन्यासकार उपन्यास के पहले ही प्रकरण में बड़े ही मनोरंजक तरीके से लेखक प्रकाश डालता है कि वह उपन्यास क्यों लिखना चाहता है और उसके सामने एक कथानक और पात्रों के चयन का संकट व भ्रम किस प्रकार से खड़ा होता है । 'जुनून' शीर्षक से शुरू हुआ यह अंश अंतत: नेकी राम नाम के एक ऐसे पात्र को नाटक का नायक चुनने के साथ समाप्त होता है जो एक आम आदमी है । लेखक मनोरंजक तरीके से यह स्वीकार करता है कि उसके नायक में फिल्मों की तरह के नायक की शक्तियां नहीं है और वह एक ऐसा आदमी है जो जीवन के संघर्षों का सामना उसी तरीके से करता है जैसे एक आदमी आमतौर पर करता है । उसमें भी वही सब कमजोरियां और विवशताएं मौजूद हैं जो एक आम आदमी में होती हैं । अपनी हास्य प्रवृत्ति के साथ लेखक यहां स्वीकार करता है कि वह भी यह उपन्यास इसलिए ही लिख रहा है ताकि उसका नाम उपन्यासकारों में शामिल हो सके ।

सरल सहज और प्रवाहमयी भाषा इस उपन्यास की जान है । न इसमें भाषा की प्रगल्भता है और न ही उसमें क्लिष्टता है । जैसे-जैसे उपन्यास आगे बढ़ता है वैसे - वैसे उसमें एक आम आदमी की अतृप्त इच्छाओं का मनोविज्ञान बहुत ही स्पष्ट एवं मनोरंजक तरीके से उभरता चला जाता है । इस उपन्यास का नायक नेकीराम अपने पिता की छठी संतान है जो बेहद गरीबी और अभाव में पलता है । मेधावी होने के बावजूद तिरस्कार उपेक्षा पाता है और दलित होने के सारे कष्ट उसके हिस्से में आते हैं । उसे दसवीं कक्षा प्रथम श्रेणी से पास करने के बावजूद शहर जाकर एक बनिए की छोटी सी नौकरी करनी पड़ती है और वह वहां अपने कल्पना लोक में विचरता हुआ बनिए की बेटी से एकतरफा इश्क कर बैठता है जिसके फलस्वरूप एक दिन उसे चांटा खाकर आहत होने के बाद वापस गांव लौटना पड़ता है ।

लेखक को लेखकों एवं कवियों व उनकी कृतियों के बारे में गहन जानकारी है जिसका उपयोग गाहे-बगाहे वह अपने उपन्यास में नाम ले लेकर करता है । आम आदमी के मनोविज्ञान से नेपाल प्रजापति बहुत अच्छे से परिचित हैं और फ्रॉयड के अतृप्त कामेच्छा मनोविज्ञान का नेकीराम तथा दूसरे पात्रों के संदर्भ में समय-समय पर बड़ी कुशलता से उपयोग करता है । वह साहित्य जगत में छाई हुई मठाधीशी, गुटबंदी एवं पुरस्कार पाने के लिए किए जाने वाले जोड़-तोड़ तथा एक दूसरे की निंदा एवं पीठ पीछे बुराई करने तथा अपना ज्ञान बघारने और दूसरे के लेखन में कमियां ढूंढने एवं उसकी छीछालेदारी करने की प्रवृत्ति पर बड़ी कुशलता से कटाक्ष करता है ।

लेखक भले ही कहे कि यह उसका पहला उपन्यास है लेकिन पुस्तक के पृष्ठ आवरण पर उसकी कृतियों का लेखा-जोखा उसके अनुभव को रेखांकित करता है । पुस्तक में लेखक ने न कोई प्राक्कथन दिया है और न ही किसी बड़े लेखक से उसकी भूमिका लिखवाई है जो उसके आत्मविश्वास को रेखांकित करता है ।

उपन्यास एक - एक करके उपन्यास के पात्रों से परीचित कराते हुए उनके चरित्र की कमजोरियां एवं खूबियां बहुत ही मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत करता है । कहीं वह उनकी शारीरिक भाव भंगिमा तो कहीं उनके चरित्र की कमजोरियां वर्णित करते हुए इन पात्रों को जीवंत बना देता है । वह सुनियोजित ढंग से लेखक के नायक नेकीराम का के चरित्र का विकास करता है और उसके जीवन संघर्ष के साथ - कविता के क्षेत्र में ज्ञान न होते हुए भी लगातार टिके रहने और दूसरे कवियों द्वारा उसके अज्ञान और कविता लिखने के चस्के का अनुचित लाभ लेने का बड़े ही मनोविनोदपूर्ण तरीके से वर्णन तो करता ही है वह इस बात की ओर भी संकेत करता है कि किस प्रकार से तथाकथित वरिष्ठ कवि ,कनिष्ठ और नए आने वाले कवियों का शोषण करने से बाज नहीं आते । 'बिसात' का आवरण प्रभावशाली है और छपाई भी स्तरीय है ।

लेखक कई बार कथानक से इधर- उधर भी होता नजर आता है और राही मासूम रजा की शैली में जब उसे लगता है कि पाठक कहीं अपनी रुचि ने खो बैठे तो वह व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर भी उसे कथानक पर लौटा कर ले आता है । उपन्यास में पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेष तौर पर सहारनपुर , मुजफ्फरनगर और मेरठ की प्रचलित 'कैरवी' के 'लिखास ,सुनास और छपाास' जैसे शब्दों का बहुतायत में उपयोग किया गया है जो इस क्षेत्र के पाठकों को मनोरंजक लगेगा । यहां की स्थानीय संस्कृति ,बोलचाल और जीवन शैली को भी यह उपन्यास रेखांकित करता है । उपन्यास में हर स्तर के पात्र मौजूद हैं जिनमें नेकीराम से लेकर प्रोफेसर तुरंगनाथ ,डॉ० निर्मल सिंह, नेहा ,डॉ मैकमोहन ,पिपासा ,खरेराम चमचा ,मिस टोना आदि अपने चरित्रों के साथ पूरा न्याय करते दिखते हैं । 'अस्तु' के साथ समाप्त होने वाला बिसात' कुल मिलाकर एक मनोरंजक ,हास्य से परिपूर्ण , सटीक व्यंग्य प्रस्तुत करता है । सहज प्रकाशन , मुजफ्फरनगर से प्रकाशित यह उपन्यास पठनीय कहा जा सकता है । हां, इसका ₹200 का मूल्य थोड़ा खटक सकता है लेकिन आज की महंगाई और सीमित प्रतियां छपने की वजह से उपन्यास पर किया गया खर्च व्यर्थ नहीं जाता।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें