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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

उसका बयां नहीं है

यूसुफ़ रईस

हरेक़ सफ़हे पर वही लिखा है कहाँ पे उसका बयां नहीं है वो जिसकी तुम सब तलाश में हो मुझे बताओ कहाँ नहीं है। बचा रहेगा ये जिस्म कब तक ज़रा ठहर के तो फ़िक्र कीजे ये जिस्म मिट्टी का एक घर है क्या तुमको इसका ग़ुमाँ नहीं है। वो चलते फिरते हैं कारखाने जिन्हें हम इंसां समझ रहे हैं वो अपनी तह में सुलग रहें हैं भले ही बाहर धुआँ नहीं है। ज़माने भर की सभी ख़ताऐं ख़ुदा जो चाहे मुआफ़ कर दे किसी ने दिल को अगर दुखाया तो फिर उसकी कोई अमाँ नहीं है। नज़र भटक के यहाँ वहाँ पे तुम्हारे चेहरे पे टिक गई थी तभी से तुम हो मेरी नज़र में कहीं किसी का निशां नहीं है। बसी हुई है मेरी नज़र में न जाने कब से जो एक सूरत ज़मीन सारी मैं छान आया मगर वो चेहरा यहां नहीं है।


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