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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

मैं फ़सानो में दर्ज हो जाता

रोहिताश्व मिश्रा

मैं फ़सानो में दर्ज हो जाता। तो किताबों में दर्ज हो जाता। मुझसे तो था निज़ाम-ए-नौ बनना, क्यों रवाजों में दर्ज हो जाता। शिद्दत-ए-प्यास गर मुक़द्दर थी, मैं सराबों में दर्ज हो जाता। गर निकलता सुकूत-ए-ज़ेहन से मै, दिल के नालों में दर्ज हो जाता। दर्द से राबिता न होता तो, वाहवाहों में दर्ज हो जाता। काश इक दिन मेरा मुक़दमा भी, तेरी बाहों में दर्ज हो जाता।


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