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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

जाने किस सफर गया

जय प्रकाश भाटिया

वह जो लिखते थे मेरी बिखरी ज़ुल्फो पे ग़ज़ल आज यह भी न पूछा कि तुम उलझी क्यों हो, पूनम का चाँद कहते थे मेरे इस हंसीं चेहरे को कभी यह भी न पूछा कि तुम बिफरी क्यों हो 'तेरी आँखे के सिवा इस दुनिया में रखा क्या है '- कहने वाले ने न जाना किआज यह क्यों बरस रही हैं वह ज़ालिम क्या जाने उसके दीदार को तरस रहीं हैं काश वह अपना होता ,मेरे इस हाल पर ग़ज़ल लिखता कुछ अपने दिल कि कहता , कुछ मेरे दिल कि सुनता और वो आया था एक मौसमी बुखार सा और उतर गया मुझे यूं ज़िंदगी भर का रोग देकर जाने किस सफर गया


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