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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

भारतीय राजनीति में इस्तीफों के निहितार्थ

सरिता सुराणा

स्वतंत्र भारत की राजनीति का इतिहास यह बताता है कि यहां पर प्रारंभिक काल में दिए गए इस्तीफों के अलावा जो भी इस्तीफे दिए गए, वे सब निजी स्वार्थ और राजनीतिक लाभ से प्रेरित होकर दिए गए। अगर सही मायने में अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से किसी ने इस्तीफा दिया तो वे थे- हमारे तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री।

उस समय अरियालुर में 27 नवंबर 1956 को भीषण ट्रेन हादसा हुआ था और उसमें 142 लोगों की मौत हो गई थी। उसके 43 साल बाद अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रेलमंत्री नीतीश कुमार ने भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए गैसाल ट्रेन हादसे के लिए (1999) अपना इस्तीफा दे दिया था। इसी क्रम में रेलमंत्री सुरेश प्रभु का नाम भी जुड़ जाता है, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में हुए दो रेल हादसों के बाद अपना इस्तीफा दे दिया था।

ये तो थे रेलमंत्रियों के नैतिक आधार पर दिए गए इस्तीफे। अब हम एक नज़र डालते हैं वर्तमान में दिए जाने वाले इस्तीफों पर और उन से होने वाले राजनीतिक लाभ पर। इसका सबसे ताजा उदाहरण है, अभी सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव 2019। जैसे ही लोकसभा चुनावों के परिणामों की घोषणा हुई और महागठबंधन के साथी एक-एक कर हारते गए, वैसे ही उनकी बेचैनी बढ़ती गई कि इस हार के लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाए।

जाहिर है कि सीधे तौर पर व्यक्तिगत रूप से यह जिम्मेदारी लेने के लिए कोई भी तैयार नहीं था। इनमें सबसे ऊपर जो नाम था, वो था कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का। उनकी स्थिति खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली हो रही थी। क्या करते बेचारे, बहुत शोर मचाया कि चौकीदार चोर है लेकिन परिणाम विपरीत हो गया। उनके इस नारे के समानांतर नारा लगा- 'मैं भी चौकीदार' और इस नारे ने तो चारों ओर धूम मचा दी, सोशल मीडिया से लेकर गली-गली, गांव-गांव चौकीदार पैदा हो गए और देश की रखवाली करने लगे।

राज्याध्यक्षों के इस्तीफे

प्रियंका गांधी जैसा तुरुप का पत्ता चलने पर भी जब कांग्रेस पार्टी चुनावों में अपनी अपेक्षानुसार रिजल्ट नहीं दे पाई तो पार्टी अध्यक्षों ने इस्तीफों की झड़ी लगा दी। इनमें सबसे प्रमुख नाम थे- कर्नाटक कांग्रेस कैंपेन कमेटी प्रेसिडेंट एच.के.पाटिल, ओडीशा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष निरंजन पटनायक, उत्तर-प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष राज बब्बर और अन्य प्रदेशों के अध्यक्ष। और तो और इन सबसे अव्वल दर्जे पर विराजमान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अपने इस्तीफे की पेशकश कमेटी के समक्ष रख दी।

अब सवाल यह उठता है कि इन सबके इस्तीफे देने के पीछे निहितार्थ क्या है? क्या ये लोग अपनी करारी हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं या फिर यह अपनी खाल और अस्तित्व बचाए रखने का ढोंग मात्र है? अगर निष्पक्ष तरीके से इस पर विचार किया जाए तो कोई भी अपने सिर पर हार की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है, बल्कि सब एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हुए नजर आ रहे हैं।

आन्तरिक कलह

राजस्थान का ही उदाहरण लें तो राहुल को लगता है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ईमानदारी से पार्टी के लिए प्रचार न करके अपने बेटे के पक्ष में प्रचार किया और इसीलिए वहां पर पार्टी का एक भी प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर पाया। जबकि गहलोत का कहना है कि सचिन पायलट ने भीतरघात करके उनके बेटे को हराया। उन्होंने अपनी तरफ से पार्टी को जिताने की पूरी कोशिश की। खैर, यहां पर पार्टी ने सामूहिक रूप से हार की जिम्मेदारी स्वीकार की और गहलोत की कुर्सी बच गई।

ठीक ऐसा ही कुछ मध्य प्रदेश में भी घटित हुआ, जब वहां के मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ ने छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से जीत हासिल की और वे इकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने जीत हासिल की। लेकिन अन्य कोई भी उम्मीदवार वहां पर जीत नहीं पाया।अब कांग्रेस पार्टी के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही है कि कुछ समय पहले ही सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में जब पार्टी ने अच्छी जीत हासिल की और तीन राज्यों में अपनी सरकार भी बनाई तो इतने कम समय में ही मतदाताओं का रुझान कैसे बदल गया।

कारण साफ है, पार्टी ने किसानों और जनता से जो वादे किए थे, उनकी असलियत सामने आ गई थी और साथ ही जगह-जगह पर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की अंतर्कलह और फूट भी। मगर राहुल को स्वयं पर और प्रियंका पर इतना अधिक भरोसा था कि इस बार तो सरकार उनकी ही बनेगी।उनका यही अति आत्मविश्वास उन्हें ले डूबा और नौबत इस्तीफे तक पहुंच गई।

क्यों देना चाहते हैं राहुल इस्तीफ़ा

लगता है कि राहुल गांधी को अब इस बात का अहसास हो गया है कि वे कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पार्टी को वो जीत और समर्थन नहीं दिला सकते, जो गांधी खानदान के पूर्व कांग्रेस अध्यक्षों ने कभी दिलाई थी। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष अपने इस्तीफे की पेशकश की। यह अलग बात है कि कार्यसमिति ने उसे स्वीकार नहीं किया और उन्हें पद पर बने रहने के लिए कहा। साथ ही नए अध्यक्ष की खोज की जिम्मेदारी अहमद पटेल और ग़ुलाम नबी आजाद पर डाल दी। इन दोनों ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं.के.एंटनी और केसी वेणुगोपाल के नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किए। परन्तु इन दोनों ही नेताओं ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया। कारण साफ है कि डूबती नैया की सवारी कोई नहीं करना चाहता।

सांगठनिक कमजोरी

चुनाव सम्पन्न होने के बाद कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरी सबके सामने उजागर हो गई है।

स्वयं राहुल गांधी को लगता है कि उनके मुख्यमंत्रियों और कार्यकर्ताओं ने उनके साथ उतना सहयोग नहीं किया, जितना करना चाहिए था और इसीलिए वे इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं।काश! कांग्रेस ने इस विषय पर पहले सोचा होता। काश! सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद इतने लम्बे समय तक ना कब्जाया होता तो आज शायद कांग्रेस इस बुरी स्थिति में ना होती। सारी दुनिया जानती है कि गांधी खानदान ने कांग्रेस को अपनी बपौती समझ रखा है और वह किसी भी कीमत पर सर्वोच्च सत्ता किसी और को सौंपने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि अब जब राहुल खुद यह जिम्मेदारी किसी और को सौंपना चाहते हैं तो कोई भी इसे लेने के लिए तैयार नहीं है। अगर कांग्रेस में इसी तरह इस्तीफों को लेकर राजनीति होती रही और इस्तीफों के निहितार्थ बदलते रहे तो उनका यह एटिट्यूड उन्हें ले डूबेगा।


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