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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

मार्कण्डेय की कहानियों में ग्रामीण जीवन

अमर कुमार चौधरी

‘नई कहानी’ आंदोलन के महत्त्वपूर्ण कहानीकार मार्कण्डेय मूलतः ग्रामीण यथार्थ के लेखक के रूप में पहचाने जाते हैं । प्रेमचंद के बाद मार्कण्डेय की कहानियों में पहली बार यथार्थ फलक पर ग्राम-जीवन को देखने, समझने और अभिव्यक्त करने की चुनौती स्वीकार की गई है । स्वातंत्र्योत्तर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक अंतर्विरोधों को देखने की सही दृष्टि मार्कण्डेय की कहानियों में मिलती है । “मार्कण्डेय मूल रूप से एक ग्राम कथाकार हैं ।” ग्रामीण किसानों तथा मजदूरों की दयनीय अवस्था का चित्रण एवं उनकी तमाम समस्याओं का समाधान ही मार्कण्डेय के साहित्य का उद्देश्य रहा है । इसी उद्देश्य से मार्कण्डेय ने किसानों और मजदूरों को अपने साहित्य का मुख्य पात्र बनाया ।

स्वाधीनता आन्दोलन के बाद बदले हुए ग्रामीण परिवेश का यथार्थपरक और नग्न चित्रण उनकी कहानियों में दिखाई देता है । उन्होंने व्यक्ति और समष्टि के विघटनकारी मूल्यों की बारीकियों को पकड़ा ही नहीं बल्कि उसका नकार भी किया । उन्होंने जब कथा-लेखन में प्रवेश किया तब देश औद्योगिकीकरण, पंचवर्षीय योजना आदितमाम विकासमान मूल्यों की तरफ गतिमान था । अम्बेडकर और गाँधी के प्रयास से दलितों में चेतना सुगबुगा रही थी । गाँव का सामजिक ढ़ांचा टूट रहा था । इस तरह की स्थिति में गाँव का एक बदला हुआ परिदृश्य दिखाई दया जिसे मार्कण्डेय ने अपनी कहानीयों में रूपायित किया । उन्होंने अपनी कहानियों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, जातिगत आदि विविध समस्याओं को अभिव्यत किया है । इनकी कहानियों का मूल कथ्य ग्राम जीवन पर आधारित होने के कारण, इन्हें प्रेमचंद की परम्परा से जोड़कर देखा जाता है । दोनों लेखक ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं लेकिन अलग-अलग देश, काल, वातावरण के कारण, दोनों लेखकों की रचना-प्रक्रिया, कथ्य-शिल्प आदि मेंभिन्नता है । प्रेमचंद के समय साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से जनता संघर्ष कर रही थी जिसे उन्होंने कहानी का विषय बनाया । लेकिन मार्कण्डेय के समय देश आज़ाद हो गया था, जमींदारी उन्मूलन भी हो गया था, जमींदार के रूप में ठेकेदार और पूंजीपति जैसी शोषणकारी शक्तियाँ पनप रहीं थीं लेकिन सामाजिक ढ़ांचे में कोई बदलाव नहीं आया । जमींदारी खत्म होने के बाद भी जमींदारों द्वारा शोषण बरकरार है । “मार्कण्डेय के किसान-चरित्र जीवन की जिन परिस्थितियों के संदर्भ में चित्रित हुए हैं वे आधुनिक भूमि-सुधारों और विकास-योजनाओं से सम्बद्ध है और इनकी भूमि-समस्याएँ नयी जीवन-व्यवस्था तथा मानसिक अवस्था को व्यंजित करती है ।”

मार्कण्डेय प्रेमचंद की परम्परा में होते हुए भी आधुनिक कथाकार हैं । इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनायी जो इनकी कहानियों में द्रष्टव्य है । इनकी कहानियों में परम्परा जड़ या रूढ़ि नहीं बल्कि आधुनिकता के नवीन सन्दर्भों को रेखांकित करती है । इस संदर्भ में आलोचकों ने लिखा है- “परम्परा में बहुत सारे लोग आते हैं । प्रेमचन्द की परम्परा का मतलब यह नहीं है कि प्रेमचंद की अनुकृति करना । परम्परा जड़ नहीं गत्यात्म होती है । अपनी गत्यात्मकता में वह कुछ चीजों को छोड़ती है कुछ चीजों क लेती है तथा कुछ नया जोडती चलती है । प्रेमचंद की परम्परा में गाँव के माध्यम से निम्नवर्ग के प्राणियों की पीड़ा, उच्चतर नैतिकता तथा संघर्ष दिखाई पड़ता है ।” मार्कण्डेय का अनुभव क्षेत्र गाँव जीवन की पैदावार है । उनके चेतन और अवचेतन में ग्रामीण जीवन की यथार्थ स्मृतियाँ व्याप्त हैं । अत: मार्कण्डेय सहज ही इस परम्परा से जुड़े हुए हैं । लेकिन यह सच है कि प्रेमचंद ने जिस ग्राम जीवन को व्यापकता से देखा था उसे मार्कण्डेय गहराई में ले गये । अत: इनकी कहानियों में व्यष्टि-समष्टि के व्यापकता और गहराई का सम्पुट योग है । उन्होंने चरित्रों के बाह्य समस्याओं को ही नहीं बल्कि आन्तरिक मन:स्थिति को पकड़ने की कोशिश की है ।

मार्कण्डेय जनवादी विचारधारा के कहानीकार है । अतः उनकी कहानियाँ को ‘ग्रामीण चेतना का जनवादी अध्ययन’ भी कहा जा सकता है । जनवादी अध्ययन का मूलभूत सिद्धान्त यह है कि जमीन पर जमींदारों के स्वामित्व का अंत हो उत्पादन पर मजदूरों का नियंत्रण हो । एक ऐसे समाज की रचना हो जिसमें मनुष्य का मनुष्य द्वारा शोषण न किया जाए । अपने साहित्य में उन लोगों की दुख भरी कहानी कही है जो जी-तोड़ मेहनत करने के बावजूद अपनी बुनियादी जरूरत पूरी करने में असमर्थ हैं । कहानी ‘बादल का टुकड़ा’ इसका अच्छा उदाहरण है । ये लोग गांवों में निवास करते हैं, जो किसान और मजदूर के रूप में हैं । इन्हीं किसानों और मजदूरों की शोषण से वास्तविक मुक्ति मार्कण्डेय जी का उद्देश्य रहा है । इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों की रचना की । मार्कण्डेय ने अपने कहानियों में ग्रामीण-जीवन का चित्रण इतने बड़े पैमाने पर किया है कि उनकी रचना सिर्फ एक गाँव या एक शहर की नहीं बल्कि पूरे भारत के गांवों व शहरों की कहानी कहती है जो दिन-रात मेहनत करने के बाद भी दो वक्त की रोटी के लिए तरसते हैं । “यह आग पानी से नहीं बुझेगी - उसने सोचा लेकिन पानी पीने का बहाना करने में क्या हर्ज है, आखिरकार तो जीना है, चाहे किसी भी बहाने और वह हाथ का गिलास लिए फिर रसोई घर में लौट गया ।”

मार्कण्डेय ग्रामीण जीवन में विद्यमान सादगी एवं सरलता से काफी प्रभावित थे । परंतु उन्हें दुख था कि ऐसे सीधे-सादे लोगों को भी शोषक अपने स्वार्थ की खातिर शोषण का शिकार बनाते हैं । जिस गाँव की सभ्यता, संस्कृति और अच्छाई के वंशीभूत होकर लोग खिंचे चले आते हैं वहाँ आकार उन्हें अन्याय, अत्याचार एवं शोषण का साम्राज्य मिलता है । उन्होंने किसानों तथा मजदूरों की दयनीय स्थिति के पीछे जमींदार वर्ग की भूमिका मानते हैं । ये जमींदार अपने स्वार्थ की खातिर बेबस किसानों और मजदूरों का शोषण करता है तथा उन्हें आर्थिक दृष्टि से समाज के समक्ष पूरे कमजोर कर देते हैं ।

किसान की मेहनत पर किसी को कोई संदेह नहीं । खेत में हाड़तोड़ मेहनत करके ही वह अपने जीवन को आगे बढ़ाता है । मेहनत किसानी जीवन की संस्कृति है । मार्कण्डेय की ‘दौने की पत्तियाँ’ कहानी मेहनती किसान की यथार्थ तस्वीर पेश करती है । कहानी में लिखा गया है – “वह मेहनत कर के खाता है । पसीना जला कर मिट्टी से अन्न जुटाता है । फिर उसके लिए दुःख कैसा ।” किसान अपने खेती-बाड़ी में कड़ी मेहनत करने के बावजूद बेहद खुश रहता है । क्योंकि खेत के साथ उनका आत्मीय लगाव होता है । लेकिन खेत के बाहर उसका मन उतना नहीं जमता । खेत के बाहर काम करने पर वह जल्दी ही थक जाता है । ‘भूदान’ कहानी में ठाकुर के कुचक्र से रामजतन को हलवाही छोड़ना पड़ता है । वह मज़दूर बन कर नहर की खुदाई में फावड़ा चला रहा है । “पिछले कई महीनों से फावड़ा चलाते-चलाते उसका शरीर सुख कर काँटा हो गया है । महीने भर से साँस की बीमारी के कारण वह चारपाई में पड़ा हाँफ रहा है, बार-बार उसकी साँसे बढ़ जाती है । उसका शरीर काँपने लगता है ।” किसान का मन खेत से इस कदर जुड़ता है कि मेहनत की थकावट भी वह भूल जाता है ।

सरकार की तरफ से सिंचाई की व्यवस्था होती है तो भी वह ठीक तरह से लागू नहीं होती । इस तथ्य की पड़ताल मार्कण्डेय की ‘दौने की पत्तियाँ’ कहानी में की गई है । कहानी में इसका चित्रण है कि पंचवर्षीय पद्धति के अंतर्गत गाँव में नहर आती है । अमीर तिवारी के खेत पर आकरकाम रुक जाता है । अपने बारह बिगहा खेत को बचाने के लिए तिवारी इंजीनियर को घूस दे कर तथा मंत्री से सिफारिश करवा कर नहर का रुख बदलवा देता है । जिस से रामजतन का पूरा खेत नहर के पेट में समा जाता है जिसे वह पाँच वर्षों तक आधे पेट खाकर खरीदा था । योजना विकास के परिप्रेक्षय में भष्टाचार के ऐसे उदहारण अपवाद नहीं है और रामजतन कोइरी जैसे कोटि-कोटि दीन-हीन जन स्वातंत्र्योत्तर विकास के रथ-चक्रों में पिस गए हैं । उनके पास उत्कोच के लिए धन-दौiलत तो क्या अपने लिए दौने की पत्तियाँ भी नहीं रह गई । भारत की राजनीति पर पूँजीपतियों और नौकरशाही की पकड ने विकास योजनाओं को लागू करने में बाधाएँ उत्पन्न कर दी । स्वातंत्र्योत्तर भारत में बनाई गयी ज्यादातर विकास योजनाऐं विफल ही रही हैं । “स्वतन्त्रता के इतने दिनों बाद भी सामंतवाद सारे संस्थागत परिवर्तनों को रोककर पहाड़ की तरह खड़ा है । भूमि-सुधार का सपना आज तक पूरा नहीं हुआ ।”

किसान के लिए उसकी भूमि ही सब कुछ है । चाहे कितनी बड़ी विपत्ति आ जाये वह अपनी भूमि से दूर होने की बात को स्वीकार नहीं कर सकता । इसे कोई हड़पना चाहे, यह कैसे संभव है । मार्कण्डेय की ‘भूदान’ कहानी में चेलिक नामक किसान का अपनी ज़मीन के लिए संघर्ष को यों दिखाया है – “सारा गाँव चेलिक को समझा रहा है । काहे को विपत लेते हो सिर पर, काहे लड़ते हो । पर नहीं, तो नहीं ! चेलिक पकड़ा गया और उसके चमड़ों में बाँस की खपच्चियाँ, पीठ पर हंटर, कमर पर लकड़ी का कुन्दा । बेहोश हो गया । मुँह से फेचकुर आने लगा, पर भूँय तो भूँय । धरती है माता, माता को कैसे दें ।” नीलहे साहब और कारिन्दा उसकी भूमि हड़पना चाहते हैं । उसका बेहद शोषण करते हैं । लेकिन चेलिक अपनी ज़मीन के लिए मर मिटने पर तुला है वह पूरी ताकत लगाकर अपनी भूमि को बचाने का प्रयत्न करता है । आखिरकार अपने प्रयास में वह सफल भी हो जाता है । “मार्कण्डेय यदि एक ओर आधुनिक भूमि सुधारों और सरकारी विकासयोजनाओं की वास्तविकता उद्घाटित करते हैं तो यहीं उन क्रांतिकारी शक्तियों को भी रेखांकित करते हैं जो स्थिति में एक गुणात्मक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध है ।”

किसान की ऐसी बदहाली है कि वह कड़ी मेहनत करने के बावजूद साल भर के लिए अन्न जुड़ा नहीं पाता । ऊपर से लगान की कर्ज और सुखा एवं बाढ़ का प्रकोप । जिससे उनका जीवन और अभावग्रस्त बन जाता है । ‘बादलों का टुकड़ा’ महाजन के कर्ज से दबे एक भूमिहीन किसान के अभावमय जीवन की ओर इशारा करता है । चिलचिलाती धूप, चारों ओर सूखा और घर में कुपोषित की तरह छोटा सर और सपाट पेट वाला बीमार बच्चा कुनाई बिस्तर पर पड़ा है । वह लगातार पतली आवाज़ में रोता रहता है । एक ओर कुनाई भूख के कारण जिन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है तो दूसरी ओर उसका बाप भूख की आग से पेट में उठनेवाली मरोड़ से हैरान दिखता है । वह भली-भांति जानता है कि यह भूख की आग पानी से नहीं बुझेगी । फिर भी वह बार-बार पानी पी कर जीवित रहने की कोशिश करता है । “उसे अपने पेट की जलन का ख्याल आया- दर्द नीचे बैठ रहा था और आखों की रोशनी साफ हो रही थी । लेकिन दर्द कही गयाथोड़े ही है ।” बच्ची के लिए थोड़ी दूध देने वाली बकरी को कारिंदा कर्ज की वसूली के रूप में खोल -कर ले जाता है । कहानी में एक ओर अकाल और भूख तथा दूसरी ओर लगान की कर्ज से दबे इस किसान परिवार का चित्र पाठक को द्रवित किए बिना नहीं रहता । यह महज एक किसान परिवार की नहीं अपितु ऐसे अनेक परिवार की कहानी है । अभावग्रस्त जीवन बिताने के लिए वह अभिशप्त है ।

किसी भी किसान समस्या को भूमि से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता । वास्तव में असंतुलित भू-वितरण ही इन सबकी धुरी है । स्वातंत्र्योत्तर देश के सत्ता के सूत्र पूंजीवादी ताकतों के हाथ जाने के कारण असमान भूमि-वितरण की समस्या अधिक भयावह बनती गई जिससे किसान की अभावमय जिन्दगी और विकराल बन गई । मार्कण्डेय की ‘कल्यानमन’ और ‘भूदान’ कहानियाँ इस सन्दर्भ में विशेष महत्वपूर्ण हैं । इन कहानियों की रचना उस समय हुई थी जब भूमि सुधार-योजना की बात हो रही थी, विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का सूत्र-पात हो चूका था । विनोबा भावे के नेतृत्व में भूदान-आन्दोलन भी अपने जोरों पर था । भूमि-हीन किसान इस आशा में इंतज़ार करने लगे थे कि अब उनके नाम पर भी ज़मीन मिल जाएगी । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । उनकी यह आकांक्षा बहुत जल्द निराशा में बदल गयी । भूमि सुधार के कानून से ज़मीन किसान के नाम सिकमी ज़रूर लग गयी । लेकिन बड़े जमींदारों से तंग होकर किसानों ने कागज़ पर दस्तखत दे कर अपनी जान बाचना ही मुनासिब समझा । “जिन आछूतों और पिछड़े वर्गों के नाम पर सरकार अपनी इजारेदारी कायम किए रही है वस्तुतः वे ही लोग निरंतर और भी पीड़ित और अभिशत होते गए हैं । भूदान में मिली जिस भूमि के लिए उसकी हलवाही भी चली जाती है ।” ‘कल्यानमन’ कहानी इस तथ्य की बखूबी उजागर करती है । कल्यानमन सोलह बीघे का एक तालाब है, जिसमें लम्बे अर्से से मंगी सिंघाड़े की खेती होती आ रही है । इस तालाब को बड़े ठाकुर ने मंगी को बखरी में पानी भरने के एवज़ में दिया था । मंगी ने जब यह सुना कि जिसकी जोत होगी भूमि उसी को हो जाएगी, तो वह बहुत खुश थी । कल्यानमन तालाब उसके नाम सिकमी भी लग गया । लेकिन उसके बाद यह ख़ुशी दुःख में तब्दील हो गयी । ठाकुर का बेटा, हर हाल में कल्यानमन को हथियाना चाहता है । इसके लिए वह तरह-तरह की चाल चलता है । मंगी प्रतिरोध करती है फिर भी वह चिंतित दिखती है- “बड़ा कानून सीख के बैठा तो है भला बची है एक बिस्सा भूय किसी मजूर-धतूर के पास ? सभी तो खेत जोत रहे थे । कोई मार खा कर इस्टिपा लिखा गया, तो किसी को बहका कर सादे कागज पर अँगूठे की टीप ले ली, इन लोगों ने । किसी को सौ-दो-सौ दे कर सादे कागद पर टीप ले ली, इन लोगों ने । किसी को सौ-दो-सौ देकर टरकाया । कहीं रह गया है कुछ ? वह तो कहो मुझे जो बैठी हूँ बज्जर की तरह छती पर ।” मंगी का यह कथन मौजूदा कृषि से जुड़े संबंधों पर तीखी टिप्पणी है । अंत में ठाकुर मंगी के इकलौते बेटे पनारू को अपनी माँ के खिलाफ भड़का कर अपनी तरफ कर लेता है । अपने प्रति बेटे का व्यवहार मंगी को भीतर से तोड़ देता है । वह बेटे को समझाता है कि “जानता नहीं की ये लोग ज़मीन के लिए, आदमी की गर्दन भी काट सकते हैं ।” मंगी केमुख से मानो देश का शोषित किसान अपनी व्यथा को मुखर करता हुआ दिखायी पड़ता है । प्रस्तुत कहानी से स्पष्ट होता है कि समाज में जिनका कब्ज़ा पहले से बना आ रहा है । वे ही आज भी बिना श्रम किए सारे सुख भोग रहे हैं ।

मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों में गंवाई किसान और खेतिहर मज़दूरों को जगह दिया । जन समुदाय के प्रति अपनी पक्षधरता को रेखांकित किया । खेती-बाड़ी के क्षेत्र में दो वर्ग मौजूद हैं । एक किसान, दूसरा भूमिहीन किसान अर्थात मज़दूर । किसान जो अपनी ज़मीन के छोटे-टुकडे पर अपने परिवार के श्रम के साथ अन्न उगाता है । उनकी दयनीय स्थिति मार्कण्डेय के सामने एक चुनौती बनी हुई थी और इसलिए उन्होंने चेलिक और भोला जैसे किसान पत्रों की अवधारणा करके किसानों को इस स्थिति से उबारने का संकल्प लिया । राष्ट्र के सेवकों से भी मार्कण्डेय यही चाहते थे कि वे किसानों के बीच जाकर उनमें आत्मविश्वास जगाए उन्हें समझाएँ कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना उनका हक है जो उन्हें मिलना चाहिए । “ग्रामीण परिवेश की अपनी कहानियों के संदर्भ में जिस क्रांतिकारी और परिवर्तनकामी चेतना का रूपायन उन्होंने किया उसका विकास परवर्ती कहानी पर बखूबी देखा जा सकता है ।”

इस प्रकार मार्कण्डेय ने जहां एक तरफ गाँव में विद्यमान समस्याओं का जिक्र किया तो वही दूसरी तरफ ग्रामीण जीवन की सरलता एवं सादगी को भी हमारे सामने रखा । मार्कण्डेय ने तत्कालीन समय में किसानों की दुरवस्था का चित्रण किया और उनके कारणों की भी चर्चा की । मौजूदा समय में भी किसानों की अवस्था में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है । भूमंडलीकरण, उदारीकरण-निजीकरन तथा आर्थिक मंदी के कारण किसानों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है । आर्थिक मंदी के कारण पूरी दुनिया के किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय है ।


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