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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

बाल सखा

मिन्नी मिश्रा

“फिर तुम.. इतनी रात को ! देखो, शोर मत मचाओ, सभी सोये हैं..जग जायेंगे | तुम्हे पता है न..समय के साथ सभी को नाचना पड़ता है |

बच्चे स्कूल जाते हैं, पति काम पर , और मैं...मूरख, अकेली दिनभर इस कोठी का धान उस कोठी करती रहती हूँ | चाहे घर के पीछे अपना जीवन खपा दो, घर के कामों का कोई मोल नहीं देता !

खैर, छोड़ो इसे | बचपन में तुम्हारे साथ बिताये पल, मुझे हमेशा सताते रहता है | पर, मैं तुम्हारी तरह स्वच्छंद उड़ान नहीं भर सकती ।

समय के साथ रिश्तों की अहमियत बदल जाती है | अब तो मैं बाल-बच्चेदार वाली हो गयी हूँ और तुम, वही कुंवारे के कुंवारे !

तुम क्या जानो शादी के बाद क्या सब परिवर्तन होता है ! ओह ! फिर से शोर, बस भी करो या..र ! पता है मुझे , बिना देखे तुम जाओगे नहीं ! ठीक है, खिड़की के पास आती हूँ, देखकर तुरंत वापस लौट जाना |

जैसे ही मैं खिड़की के पास पहुंची, एकाएक बिजली की कौंध से ... उसका, वही नटखट चेहरा, साफ़-साफ़ दिख गया | दिल के कोने में दबा प्यार फिर से हिलकोर मारने लगा।

मैं..झट दरवाजा खोल बाहर निकल आई | दरवाजे की चरमराहट से पति जगते ही चिल्लाये, “ क्या हुआ? कहाँ जा रही हो ?” कहते-कहते वो भी मेरे पीछे , दरवाजे के पास आ पहुँचे |

सामने टकटकी लगाये, उताहुल खड़ा... मेरा बाल सखा ‘तूफान' और अंदर, सुरक्षा का ढाल लिए खड़े पति | अकस्मात, दहलीज से बाहर निकले मेरे पैर .... कमरे में फिर से कैद हो गए |

मेरी नजरें तूफ़ान और टिकी रही | बाहर खड़ा तूफान...एकदम शांत हो गया । शायद, अबतक वो समझ चुका था , कि औरत ख्वाबों में उड़ान भरने से ज्यादा .. अपने को महफ़ूज रखना अधिक पसंद करती है।


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