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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

एक मुलाकात संतुष्टि से...!!

आंचल सोनी

मैं तैयार हो कर आफिस के लिए निकल ही रहा था कि मां का फोन आया। खुशी से फूले न समाती हुई, मां कहने लगी ... तुम मामा बन गये। श्री को लड़की हुई है। मेरी खुशी का ठिकाना ना था। मुझे पहली दफा भैया की शिवाय रिश्तो का कोई और पद प्राप्त हुआ था। वह भी मामा का। मैं फिलहाल ही मां से कह पड़ा मुझे उसकी फोटो व्हाट्सएप करो, मां ने कहा सब इस माहौल में व्यस्त हैं। बस तु जल्दी से आजा। अब मैं ठहरा बचपन से जरा बेसब्र। मैंने कहा अन्नू ( मेरी छोटी बहन) को बोलो मुझे जल्दी व्हाट्सएप करे। मां बचपन से मेरी बेसब्री से बखूबी वाकिफ थी। फोन रखते ही 10 मिनट के अंदर मेरे पास मेरी प्यारी भांजी का फोटो आ गया। वाह कितनी खूबसूरत है। यह तो बिल्कुल श्री पर गई है। मैं श्री से पूरे 5 साल बड़ा था। इसलिए मैंने श्री के बचपन को और उसके बचपना को बड़े करीब से देखा था। वह वक्त तो आज भी मेरे ख्याल में है, जब मैं क्रिकेट का बड़ा दीवाना हुआ करता था। और फील्ड में क्रिकेट खेलते-खेलते जब शाम ढलने के बाद भी घर नहीं पहुंचता, तो दादी जो मुझे बहुत प्यार करती थी। वह श्री से कह भेजती थी... जा बबुआ को बुला ला। मैं अच्छे से जानता था। कि मुझे बुलाने के लिए श्री को दादी ने भेजा है। लेकिन फिर भी मुझे गुस्सा श्री पर आता था।

यह ना हर रोज हर बीच खेल में मुझे परेशान करने आ जाती है। और एक बार तो जाने अनजाने में मैंने हद ही कर दी... जब उस दिन पूरे योजना के साथ हम और हमारे दोस्त सभी 2 टीम में विभाजित होकर क्रिकेट खेल रहे थे। और फिर रोजाना की तरह शाम ढलते ही श्री मुझे बुलाने चली आई और मैंने गुस्से में आकर अनजाने में उस पर हाथ उठा दिया। मैं श्री से पुरे 5 साल बड़ा होने का उस पर बड़ा रोब जमाया करता था। पर वह मेरी पहली और आखरी गलती थी। पहले तो मुझे बहुत अफसोस होता था, पर जैसे जैसे बडा़ हुआ यह अफसोस कहीं दबता चला गया। आखिर मैं भी था तो बच्चा ही। मेरी भांजी बिल्कुल श्री पर गई थी। वहीं श्री जैसी तीखी नाक, श्री जैसी आंखें वाह मैंने तो सोच भी लिया है... कि इसका नाम मति रखूंगा। "मेरी श्री की मती" मेरी प्यारी श्री दुलारी मती। वैसे भी मैंने सुना है, हर व्यक्ति पर उसके नाम का प्रभाव अवश्य पड़ता है। तो मेरी मति की मती बिल्कुल श्री के जैसी बुद्धि मती होगी। अब मैंने अपने ऑफिस में फोन कर अपने सीनियर से आकाश्मिक छुट्टी ली और रेलवे स्टेशन की तरफ निकल पड़ा। बहुत जल्दी-जल्दी चलने के बाद मुझे समय पर ट्रेन मिल गई। वैसे तो रिजर्वेशन के बिना ट्रेन का सफर ऐसे ही बड़ा दुखदाई होता है। पर एक तो मैं जल्दी में ऊपर से लोकल ट्रेन मध्यम श्रेणी के व्यक्तियों से हर बोगी में बड़ी भीड़ थी। बैठना तो दूर खड़े रहकर 3:30 घंटे बिताना भी बड़ा मुश्किल था। पर अब जैसी भी हो मुझे घर जाना था, तो कुछ 4-5 बोगियों में ताक-झांक करने के बाद मुझे एक बोगी में भीड़ कुछ कम मिली, बैठना तो मुमकिन इस बोगी में भी नहीं था। पर हां आराम से खड़ा हो हुआ जा सकता था। मैंने जैसी बोगी में प्रवेश लिए कुछ 2 मिनट खड़ा ही रहा हो रहा था, कि बगल की सीट पर बैठे एक सज्जन उठकर बोगी से बाहर निकलते हैं। अब क्योंकि मैं उनके करीब ही खड़ा था, इसलिए बिना किसी का मुंह देखे मैंने फिलहाल ही खाली सीट पर अपना आसन जमा लिया। ट्रेन खुल चुकी थी, अब कुछ 3:30 घंटे का सफर तय करने के बाद मैं घर पहुंचता। अब करीब करीब 2 घंटे बीत चुके थे। जैसे ही अगले प्लेटफार्म पर ट्रेन कुछ देर के लिए रूकी ट्रेन के पुन: खुलने से पूर्व ही, एक अत्यन्त वृद्ध गरीब महिला ट्रेन में प्रवेश की। वृद्धावस्था के अनुसार स्वाभाविक रूप से उनकी त्वचा पर ना सिर्फ झुर्रियां आ गई थी। बल्कि पुराने बरगद के पेड़ के छाल सी सुख भी गई थी। वह मेरे बोगी में उपस्थित प्रत्येक यात्रियों से बारंबार अंजुरी फैलाए भिक्षा मांग रही थी। मैंने गौर किया कि

.. कोई दो पांच के सिक्के दे रहा था, बहुत दया आने पर कोई दस के नोट दे रहा था। और कुछ निर्दई तो ऐसे भी थे, जो उन्हें बड़े बेरहमी से धुधकार कर भगा रहे थे। उनके धुधकार से उनकी आंखों में नमी थी। पर आंसू बाहर तक नहीं आ पा रहे थे। जाहिर था, उन्हें इस दुर्व्यवहार की अब आदत से हो गई थी। और हो भी क्यों ना... "भला स्वाभिमान तो वहां जगता है, जब हम या कोई और अपना हाथ जुबान और स्वाद के लिए फैला रहे हों, पर जब पेट की भूख ने हमारे अंदर होर मचा रखी हो... तो क्या स्वाभिमान क्या अभिमान! यह दोनों तो उस वक्त चिर निद्रा में सो रहे होते हैं। जो ना ही जगते हैं और ना ही इन्हें हम जगाना चाहते हैं।"

शायद इसीलिए उन वृद्धा ने भी अपने सम्मान का ख्याल ना किया और पूर्ववत ही बारंबार सभी यात्रियों के सामने अधूरी फैलाए भिक्षा मांग रही थी। मैं उन्हें गौर से देख रहा था, सच कहूं तो मुझको उनमें मेरी दादी दिख रही थी। मैं भावुक था। कुछ आगे बढ़ती उन्होंने भी मुझे देखा शायद मेरी नजरों में उमड़ती भावुखता को उन्होंने परख लिया था। तभी तो मुझसे पहले चार पांच यात्रियों को छोड़ वह सीधा मेरी ओर बढ़ने लगी। अंजुरी फैलाए मेरे नजदीक आकर अपनी आंखों की नमी को दबाते हुए एक धीमी सी मुस्कान दे रही थी। जिस मुस्कान में मुझसे कुछ मिलने की आशा साफ नजर आ रही थी। मैं पहले ही अपने मती से मिलने के लिए बहुत खुश था और अब इन्हें देखकर भावुक भी हो उठा। तो भला उनका आशा निराशा में कैसे तब्दील होने देता, मैंने अपने पर्स से 500 का नोट निकाल कर उसके अंजुरी में दोनों हाथों से डाल दिया। उनकी यह धीमी सी मुस्कान अब पूरी मुस्कान में बदल गई। जिस आंखों की नमी को तकलीफ़ के कारण तब से उन्होंने दबा रखा था। अब वह खुशी के मारे छलक पड़ी। अपने आंचल से उन्होंने अपने आंसुओं को पोछते हुए, मेरे सर पर हाथ रखे उन्होंने ढेरों आशीर्वाद दिया। और आगे की तरफ बढ़ गई। पर अब उन्हें किसी यात्री से उन्हें कुछ पाने की उम्मीद नहीं थी। मैंने देखा कि वह चुपचाप जाकर नीचे बैठ गई। जाहिर था... उन्हें उस वक्त की जरूरत से ज्यादा मिल चुका था। इसलिए वह संतुष्ट थी। पर मुझे उस वक्त यह बात समझ नहीं आई की जरूरत से कुछ ज्यादा तो हम सब को भी मिलता है। फिर संतुष्टि हमारे अंदर कहां छिपी बैठी है। जो कभी हमसे रूबरू ही नहीं होती। हां वृद्धा को उस वक्त की जरूरत से कुछ ज्यादा मिल चुका था। पर आगे आने वाली दिनों के लिए नहीं।

पर हम सब तो पढ़ कर भी इस बात से वाकिफ नहीं है। पर वह शायद बखूबी वाकिफ थी। कि, भगवान ने जब भूख बनाया है, तो भोजन भी अवश्य देंगे। और वह संतुष्ट होकर जा बैठी।

मुझे महात्मा बुद्ध की वह कहानी याद आ गई - जब वह महानिभिष्कमड़ अर्थात गृह त्याग के दौरान जब सन्यासी बन उपवास रहा करते थे। वह पूरे दिन भर में किसी एक घर से ही भीक्षा प्राप्त करते थे। जितना मिल जाए संतुष्ट रहा करते थे। चाहे वह पेट भरने के लिए काफी हो या कम हो। वह प्रभु पर भरोसा रख सिर्फ आज का ही सोचा करते थे। कल के लिए कुछ जोगा कर नहीं रखते थे।

अब कुछ अगले 15:20 मिनट बाद मैं भी ट्रेन से उतरने वाला था। मैंने गौर किया कि वह संतुष्ट वृद्धा ने किसी के सामने अंजुरी नहीं फैलाई और ट्रेन के रुकते ही वह बोगी से उतर गई। अब तक मैं प्रेरक कहानियों में सिर्फ संतुष्टि की गाथा सुना था, पर संतुष्टि की परिभाषा से मैं जिंदगी में पहली मर्तबा उस दिन मिला था।

प्रिय पाठकों मैंने अपनी लेखनी के माध्यम से सत्य घटना पर आधारित संतुष्टि की इस परिभाषा से आप सभी को रूबरू जरूर कराया है। मैंने इस घटनाक्रम को आपसे साझा किया है। पर इसका यह मतलब नहीं कि जिंदगी के हर पहलू में हमारे पास जो कुछ भी है। उसे रब की मर्जी मानकर स्वीकार किए संतुष्ट होकर बैठ जाए। हां यह सच है, कि-

" हमारी मर्जी का हो तो बेहतर हमारी मर्जी का ना हो तो और भी बेहतर क्योंकि क्युंकी उसमें रब की मर्जी होती है।" पर इसका यह मतलब नहीं कि हम जिंदगी के हर पहलू में इस सूत्र को अपनाएं, संतुष्टि किए बैठ जाएं। क्योंकि किसी महान साहित्यकार ने कहा है...-

हां संतुष्टि जरूरी है, हर शख्स के लिए
पर हर पहलू में नहीं।
कदापि नहीं भूलना इस सत्य को की,
संतुष्टि सफलता को रोकती है।।

हां संतुष्टि जरूरी है, हमारे आपकी सभी के लिए। पर लक्ष्य को प्राप्त करने से पहले ही संतुष्ट हो जाना बिलकुल भी जायज नहीं। यह संतुष्टि आपको आपके वर्तमान में प्रसन्न अवश्य रख सकती है। पर भविष्य का वह कल कभी नहीं आने देगी जिसमें... "

आपकी पहचान आपके और आपके अपनों के अलावा कई गैरों के दिल में आरजू जगाए बैठी हो।।


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