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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

शक्कर के दाने

सुशील शर्मा

जब भी संतृप्त अपरिहार्य और व्यस्त जिंदगी के कुछ भागते पलों के बीच खूंटी से टंगी समय की पगडंडियों को झाड़ पोंछ कर फैलाता हूँ तो पाता हूँ अपने शहर के कुछ बहुत पुराने अपने घर शक्कर के दानों की तरह मीठे कुछ तंग गलियां,सीधे खड़े घाट राठी के तिग्गड़े से छिड़ाव घाट तक फैला। मेरा शहर कितना अपना सा गंज की रामलीला और थाने की आर्केस्ट्रा तक सब कुछ कितना सुनहरा। गोपाल नाई की दुकान पर राजनीतिक तपसरे, उच्छ्व महाराज की लोंगलता, दिप्पू बनिये के समोसे शक्कर का वो निर्मल मीठा जल वो हरे भरे गेंहूँ के खेत, स्टेशन तक घोड़े तांगे की सवारी। स्कूल तक जाने के लिए अपने भाई से साइकिल के लिए झगड़ा। वो डोल ग्यारस के विमान, रात भर टाकीज में फ़िल्म, बी टी आई स्कूल में मित्रों की शरारतें। मैं कूदता था नालों में, पोखरों में नदिया में जाने से अम्मा डाँटती थीं। भाई करता था मेरा अनुशरण उसकी हर शैतानी का जिम्मेवार मैं ही था। उन पगडंडियों पर वो सभी चेहरे जो बन गए मील के पत्थर। सब मिले मुझे वक्त की पगडंडियों में। आज का शहर कितना अजनबी जीवन,और विकास के क्रम में धूल धूप और अजनबी पन से सना। कालोनियों में बंटता अपनापन, सूखी लुटती शक्कर, बिजली कारखाने की काली डस्ट, फैशनेबल नई पीढ़ी अनगिनित चीखते ,रेत ढोते डम्पर कोलाहल के सन्नाटें में गुम होता मेरा अपना शहर। वही दरो दीवार किन्तु सब अजनबी चेहरे रिक्तता लिये। कुछ अपने पहचाने चेहरे आज भी मिलते हैं मीठे शक्कर के दानों की तरह। जिन्दगी की रेस से निकलकर अपनी यादों का एक राऊंड लगाने चलो चलें उस पुराने शहर में।


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