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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

भिखारी

सुनील मिश्रा ' शोधार्थी'

लड़खड़ाती चाल और उस लाश के होंठों पर मरे हुये सारहीन शब्द थे । और क्या था? क़िस्मत के हाथों में फूटा हुआ पात्र था । जर्जर शरीर में अलगनी की तरह लटकती हुई खाल थी, निराश ताकती हुईं आंखें निरीहता के साथ दसों दिशाओं में दो रोटी और घूंट भर पानी के लिए दर-बदर भटक रहा था, असली मतलब वही जानता है जो मांगता है भरी दुपहरी में भीख....


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