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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

पुनश्च:

श्रीकृष्ण सैनी

जाने अनजाने मैं कभी कभी मानव स्वभावानुरूप अपने चारों ओर स्वाकांक्षाओं का एक काल्पनिक वृत खीचं लेता हूँ । और फिर टालस्टाय की कथा के पात्र पाखोम की भाँति जीवन की संध्या होने से पूर्व स्वयं से दूर भागते हुए अधिक से अधिक पाने की चाह में भटक जाता हूँ सारे घटनाक्रम का केन्द्र बिन्दू स्वयं होते हुए भी स्वयं ही को खो देता हूँ । किसी अन्य आश्रय की अनुपस्थिति में मेरा यह चंचल मन एक अदृश्य पात्र का रूप ले कर मुझे झकझोर देता है और कहता है, ‘‘हे शब्दों के जादूगर !! क्या हो गया है तुम्हें ? अपने सामथर्य को पहचानो । सब को इस दुराग्रह से बचाते हुए स्वयं उसी जाल में फंसते जा रहे हो ?’’ और फिर मैं पवनपुत्र हनुमान जी की तरह स्वबल को पहचान कर, अपना सर झटक कर इस काल्पनिक वृत को तोड़ देता हूँ, और लौट आता हूँ केन्द्र बिन्दू अर्थात स्वयं पर ।


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