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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

कागज की नाव

श्रीकृष्ण सैनी

हां मै एक कवि हूँ, जिसके मन में एक आत्मिक सन्तोष है, एक कल्पना को शब्दों के सहयोग से एक रचना के रूप में ढाल पाने का । इस ध्वनि प्रदूषित जग में वाद विवाद के, परस्पर मतभेदी स्वरों के, इक दूजे पर दोषारोपण के, उन तथाकथित जनप्रतिनिधियों के झूठे ओजस्वी भाषणों के, कागजी आश्वासनों के, सब के मिश्रित कोलाहल से सत्य को ढूंढ पाने का । जिसकी आत्मा तृप्त है कि उसने अपनी कविता के माध्यम से एक संदेश दिया है जग को, मुखरित किया है एक समस्या को ताकि अनभिज्ञ भी उसे जान सके और सचेत हो सके, समाधान हेतू उपाय ढूंढ सके । लेकिन मेरे ही भीतर अशांत हो कर जब जठराग्नि ज्वालामय होती है तो उसे बुझाने हेतू मेरे पास रोटी नामक जल बहुधा नहीं होता है। अतः हंसते हैं श्रोता, कह भी देते हैं कभी कभी ‘‘पगला कवि है बेचारा ...’’ हां, शायद सच भी तो है न, क्योंकि सन्तोष से पेट तो नहीं भरता । और फिर कहा भी तो है न कि ‘‘भूखे भजन न होए गोपाला..’’ अतः यूं कहना सर्वथा उचित होगा कि स्वयं कागज की नाव में सवार हो कर किनारे चलतों को तूफान से सचेत करना, सचमुच हास्यापद ही तो है न ।


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