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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

सृजन

शंकर सिंह

नदी ने चाहा बूंदों का स्पर्श बादलों ने सुनी जो ये बात दौड़ पड़े वो तितर बितर हुए थे जो एकत्रित हुए नदी के पास आये नदी सोई थी तब नदी का स्पर्श कर बादलों ने हवा से गुप्तगू की पहाड़ ने बादलों का स्वागत किया बादलों ने बाहें खोल पहाड़ो का आलिंगन किया बुँदे सृष्टि के सृजन का राज लिए नदी मे घूल आयी नदी हंसी बादल खूब नृत्य करते हवा धून बजाती ! सृष्टि का हरेक क्षण सृजन से ओतप्रोत हो गीत गाता मानव दूर गगन को छूने कि आस लिए दौड़ लगाता अनवरत दौड़ लगाता आकाश बाहें फैलाये सृजन का उद्घोष करता !


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