मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

हाँ, मैं मिट्टी हूँ

शबनम शर्मा

आँचल में लावा समेटे हीरे, मणिकों का बिछौना लपेटे हाँ, मैं मिट्टी हूँ। भूखों की खुराक संभाले, लखों दिलों का दर्द समेटे हाँ, मैं मिट्टी हूँ। वक्ष पर मेरे तू बैठ, ऐ मानव तू इम्तिहान लिये जाता है करोड़ों का बोझ समेटे हाँ, मैं मिट्टी हूँ। शान्त हूँ, चुप हूँ, ऐ मानव, तुझसे मैं कभी कुछ नहीं माँगती, देवों का सा बल समेटे, हाँ, मैं मिट्टी हूँ। सागर की लहरों को पकड़े, सम्पूर्ण सृष्टि की जड़े हूँ जकड़े, कई लाशों की राख समेटे, हाँ, मैं मिट्टी हूँ। कहीं बर्फ सी जम जाती हूँ, कहीं तूफान सी बन जाती हूँ, नदियों, पहाड़ों, पर्वतों को समेटे, हाँ, मैं मिट्टी हूँ। ऐ मानव, तेरे महल, मन्दिर, गुरुद्वारे, मस्जिद, तेरा साँस, तेरी अग्नि खुद में समेटे, मैं शान्त मूक, तेरे पाँव तले की मिट्टी हूँ, हाँ, मैं तेरे पाँव तले की मिट्टी हूँ।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें