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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

लहुलुहान अखबार

शबनम शर्मा

एक दिन सुबह उठते ही इक लहुलुहान अखबार मुझे लिपट गई व चीख-चीख कर रोने लगी। मैंने उसे ढांढस बंधाया और उसकी दासतान सुनने के लिए, उसे कुर्सी पर बिठाया। बोली सीना फाड़कर वह देख-देख कितने शहीदों का खून मुझ पर लगा है, ये ही नहीं कितनी दुर्घटनाओं, बलात्कारों व कई हवाई दुर्घटनाओं के उलीचे हुए खून के छींटे भी पड़े हैं मुझ पर। ये एक दिन की बात नहीं रोज़मर्रा की बात बन गई है थक गई हूँ, हार गई हूँ, कुछ रास्ता दिखा मुझे वह चुपचाप अपना आंचल संभाल बैठ गई, जब उसने देखा कि उसे देख मेरी आँखों से खून टपक रहा था।


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