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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

रोग

सत्येंद्र कुमार मिश्र 'शरत्'

लग जायें ज़माने के सारे रोग, सह लेंगे, जी लेंगे किसी तरह भी उफ़ तक ना करेंगे। ना लगे तो इश्क़ का रोग कैसे जिएंगे तेरे बिना। हर पल उठती है तड़प सीने में तेरी याद बनकर, रोंम रोंम पीर से पुकार उठता है तुझे। वर्षों के सारे संघर्ष सारी साधना हवा हो जाते हैं जब कौंधता है बिजली की तरह मेरे मानस के आकाश में तेरा वह सदा हंसता जादुई चेहरा।


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