मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

यादों में बंधे हुए पल

संतोष श्रीवास्तव

तुम्हारी याद आई वासंती पलों के बिखर गए रेशे मन तड़पा फिर से तितलियां पकड़ने को फिर होने को लहूलुहान कांटे से लगे हुए देह पर खरोंचों के बेमतलब ही कई निशान फिर से तैयार होने लगा मन खाने को धोखे सुर्खाबो के पोर पोर बजते से बियाबान थमे यादों की धूप में नहाए पल वासंती फूल बन सजे बंधे हुए पन्ने फिर उड़ने लगे जिंदगी की बंद किताब के


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें