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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

ऑन लाइन मित्र

रवि रंजन गोस्वामी

खोजत खोजत जे फिरें मित्र कहूँ न पायेँ आपा धापी छोड़ के ऑनलाइन हो जाएँ। हम भी सोशल हो गये सबसे मिलना छोड़। ऑनलाइन मित्र बनाने की मची हुई है होड। व्हाट्सअप पे करते सभी दे चाट पे चाट। मुंह में पानी आ गया पर ये और ही चाट। सिवा पड़ोसी सभी से गुड मॉर्निंग हो जाये। फेसबुक खोलें अभी तो फिर कुछ बतियाये। कोउ काहू से कम नहीं नई तकनीकों का ज़ोर। जो हम न अपनाएँगे और बने सिर मोर ।


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