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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

वो किन्नर था

डॉ.रचनासिंह"रश्मि"

साड़ी में लिपटा कद लंबा आवाज मर्दाना रूप सलोना था माथे पर बिंदी हाथों में चूड़ी सिर पे साड़ी का पल्ला अर्धनारीश्वर रुप में वो किन्नर था। अपनों ने ठुकराया न पिता को प्यारा न मां का राज दुलारा सबने दुत्कारा था जमाने ने उपहास उड़ाया न स्त्री न पुरुष दुनिया में जन्म किन्नर का पाया था । नर-नारी की जंग में ना जाने! दर्द कितना पाया खाकर गाली बजाकर ताली बांधकर घंघूरु झूम कर नाचा गाकर बधाई देकर दुआएं नेग पाकर वो किन्नर कहलाया था। न साथी,सहेली तन्हा सा अकेला मन में सतरंगी सपनों का बसेरा होठों पर मुस्कान दिल में दर्द छुपाया था काया पुरुष की मन नारी का पाया वो किन्नर था बदनसीब ने मर कर भी अपनों का कंधा ना पाया था उसका कसूर बस इतना #किन्नर रुप में दुनिया आया था ।


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