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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

पलायन की मार

पवनेष ठकुराठी ‘पवन’

गाँवों पर पड़ी जब से पलायन की मार प्यारे तब से रो रहे हैं वतन के गाँव सारे। खेत और खलिहान सब सो गये हैं नींद में बचे-खुचे लोग सब जी रहे उम्मीद में गांवों ने जब निभाई अनुकरण की रश्म प्यारे तब से रो रहे हैं वतन के गाँव सारे। परंपरा गायब हुईं खो गईं सब रीतियाँ जी रहीं अब भी वहाँ स्वच्छंद हो कुरीतियाँ गांवों ने जब उतारी निज सभ्यता की टोप प्यारे तब से रो रहे हैं वतन के गाँव सारे।।


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