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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

मेरा गाँव

पवनेष ठकुराठी ‘पवन’

पंछी गा रहे हैं शाखों पर शबनम नाच रही है पत्तों पर भंवरे मस्त हैं फूलों पर तितलियाँ झूल रही हैं झूलों पर डाकिया ले जा रहा है पत्र कच्ची पुलिया पर चलकर नदी के उस पार बारात गुजर रही है सरसों के खेतों से होकर गूंज रही है ध्वनि हवाओं में नगाड़ों की मेरे गांव की छवि अभी लग रही है अठारह वर्ष के युवा-सी।


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