मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

पितृ दिवस -15 जून के लिए
पिता के नाम एक कविता

पद्मा मिश्रा

यह तुम्हारा स्नेह ही तो था, जो संघर्षों के जंगल में, किसी बासंती बयार की तरह, सहलाता रहा मेरे शूल चुभे पांवों को. फूलों की सेज न सही, हरियाली तो थी मेरे सामने .. खुले आकाश की तरह. कुछ सपने थे इन्द्रधनुषी, .. कल्पना के पंखों पर तैरते हुए.. किसी अज्ञात मंजिल की तलाश में- यह तुम्हारा स्नेह ही तो था- जिसने मेरे थके पांवों को एक दिशा दी, भटके हुए रेगिस्तान में -पानी की एक बूंद की तरह.. चातक सा मन भटकता रहा, किसी स्वाति बूंद की तलाश में- पलकों पर छाये बादल घने होते गए, अँधियारा घिरने लगा- यह तुम्हारा स्नेह ही तो था, जिसने प्यासे होठों को , अंतर के आन्सुवों से सींचा था. ओ पिता!,..माँ, तुम हो तो मैं हूँ, मेरे सपने हैं..मेरे ग भी, मैंने पार किये खाई, जंगल ,पहाड़, संवारा अपनेसुरभित आकाश को, यह तुम्हारा स्नेह ही तो था, - जो चलतारहा, प्रति पल, प्रति क्षण, - मेरी साँसों के साथ साथ ...


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें