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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

यादें

गीता घिलोरिया

जैसे सफ़ेद-सलेटी-श्यामल राख कुछ जल-बुझ कर बिखर गयीं कुछ ऐसी जली.. कि अब तक यूँ की यूँ, ज्यूँ की त्यों अपने स्वाह होने का अह्साह दिलाती हैं… वहीं… उसी मिट्‍टी के लिपे-पुते चूल्हे में जो... कुछ ख़ुद भीतर-भीतर जला कुछ लकडियों के साथ जला कुछ लाल हुआ, कुछ काला कुछ भूर गया, कुछ खोंचा गया कुछ यहाँ से टूटा, वहाँ से झड़ा ठंडा होगा एक रोज़ तो बनाने वाला देखेगा..!


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