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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

जिस्म

गीता घिलोरिया

अभी ज़ख्म हरे है, और आप की जरूरतों से परे है , कुछ देर ठहरो रहगुज़र ... जिस्म से लेकर रुह तक...अभी तो सब बहरें है ...!! रुकी हुई है आह! मेरी, झुकी हुई है छाँह मेरी, धड़कने चुभ रही है सीने में, हाथ को हाथ नही है करीने में .. कुछ देर ठहरो रहगुज़र ... आस, साँस, सपने, सब ...अभी तो सब ठहरें है ...!! समेट लूँ खुद को पहले, सिमट जाऊँ कुछ तो पहले, उकेरेंगे तुम्हें किरमिच पर फिर, भिगोंयेंगे रगों से सींच सांच कर, तब तक ठहरो रहगुज़र ... तब तक, जब तक ये सब ठहरें है !!


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