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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

चाँद निकल आया है

देवेन्द्र कुमार राय

देखो चाँद निकल आया है। मुंडेरे से अपलक झांके सितारों का हार लिए, जूगनू के बिन्दी पहने बादलों की घूँघट किए, रजनी दुल्हन का श्रृंगार निरख निरख के अन्तः से तारों का मन ललचाया है। देखो चाँद निकल आयि है। ओस की बारात सजी है मन्थर हवा की गीत, पत्तियों ने चँवर डोलाया है रौशनी मनमीत, भोर द्वारे आया है। देखो चाँद निकल आया है।


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