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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

भोजपुरी कवितायेँ

देवेन्द्र कुमार राय

(01)
सभ पुरनका बिना काम के
बगदल संस्कार अवरु बेवहार मरल बा लागे नीमन पहिलका सभ सरल बा, नयका दुनिया कहेले रोज लठ मार के सभके धोकरी में खाली जहर भरल बा।। अंखिया खाली नाचे निरेखे नयका जुग के रुप के देखे, अंखिया अछइत लउके ना जोति जगत के मरल बा।। सभे कहे तुं बाड़ पुरनिया समझि ना पइब नयका दुनिया, एहीजा केहू केहूके नइखे लउके नीमन उ त सरल बा।। सुन देख आ आपन राख लेहाज बाजी ना केकरो बजावल साज, छटपटइला से धुन सुर ना पकडी़ राय के जोगवल सभ धन जरल बा।।
(02)

कतहीं लउके ना जोति
मन के अंगना में सगरो आन्हार भइल बा, सोंच के कुंचा के खरिका खीआ गइल बा। संस्कार सिसिकत ढकचत चले राह में, लोर भावना के सगरो सुखा गइल बा। जीनीगी धरती में लउके ना कतहीं नमी, स्वार्थ के कोंढी़ तबो त फुला गइल बा। बोवल बेवहा के अंकुर फुटल ना कबो, बाकी फउके के आदत धरा गइल बा। छल के आन्ही मे आम सोंच के कोलांसी भइल, सगरो धोखा के फेंड़ अब धधा गइल बा। मन के कोठिला में कुछऊ हम संइचीं धरी, बाकी पल पल के चैन अब छीना गइल बा। छल कुहरा अब अइसन आन्हार कइले बा, एह में एक दोसरा से सभे छिनीगा गइल बा। फेंड़ अछइत अगुती पिछुती ना छांह मिलता, राय रग रग में जहर घोरा गइल बा।

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