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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

अतीत वह मेरा

अनिल कुमार

लौट जाता हूँ कभी अतीत के पंछियों की ओर उलझनों के बादलों से घिर जब समझ नहीं पाता जीवन की गति और किनोर तो लेता हूँ आसरा कुछ पलों का झूठा ही सही अतीत के बागों से बसन्त की हरियाली और मुस्काते फूलों से पाता हूँ जिस में एक रस की एक हिलोर जो पूरानी है पर मूल्य रखती और देती जो वर्तमान के दु:ख-निराशा में आनन्द की क्षणिक पर तम में जुगनू सी आशा की चमकीली बिजली बादलों में रस देकर नव अंकुरण करने को अमृत की डोर सुख का आनन्द बन यह अतीत में लौट आना मेरा पूरातन होना नहीं न है रूढ़िवादी होना जो चिपका हो अतीत से लेकर वर्तमान की जमीन मेरा अतीत को लौट जाना वर्तमान को काब़िल बनाना है गलतियों को मिटाना और आनन्द को पाना है तो वर्तमान होकर मैं उससे भी कुछ लेता हूँ कल वर्तमान था यह मेरा आज बन गया जो अतीत का घेरा है जो बेहतर करने को कहता मुझ से वर्तमान को वह कचरा नहीं अतीत वह मेरा है।


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