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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

कैसे समेटूँ

डॉ० अनिल चड्डा

कितनी बार समेटूँ तेरी यादों को और अपने ज़हन से बाहर करूँ तेरी बिखरी ज़ुल्फों की तरह ये फिर से उलझ जाती हैं मेरी यादों के जहान से और बिखरा देती हैं मेरी सुकून से ठहरी हुई जिंदगी को!!


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