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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

एक भूखा चूजा...

आंचल सोनी

काली घटा थी, तूफानी हवा थी। धूलों के कुहरों से, भरे थे वो मौसम। इतने में एक पंक्षी, घोंसले में चिंतित पड़ी थी। भूखी,प्यासी ,चिंतित थी वो, और लगा रही थी... खुदा से गुहार। ए खुदा रोक ले, तू इन तूफानी हवाओं को। मेरा चूजा दो दिनों से, भूखा प्यासा यूं ही पड़ा है। मुझे फिक्र नहीं है अपनी, मुझे फिक्र है,अपने लाल की। मैं भी कितनी बावली थी, इन तूफानों की पूर्व मैं दाना चुग ला ना सकी। देर से ही सही मगर खुदा ने कबूली... पक्षी की गुजारिश। इतने में पंछी भी, लाल से अपने कहने लगी... "सुन तू मेरे प्यारे लाल ना करना कोई मनमानी तू, अभी दुनिया से अनजान है तू। अगर इधर उधर भटक गया, तो बन जाएगा शिकार तू।" पंछी ने अभी उड़ान भरी थी, तभी उसे कुछ महसूस हुआ मानो सदा के लिए जीवन से उसके कुछ तो है... जो छूट रहा है। चूजे को अकेला देख, उसे कुछ तकलीफ सी हुई मगर उसे भूख से पीड़ित देख भर दी उड़ान पंक्षी ने, दाने के तलाश में। दाना चुनकर लाने में, पक्षी को ज़रा देर हुई। और इधर उसके लाल को भूख की पीड़ा सहन ना हुई। वो घोंसले से बाहर निकला, इधर उधर ताकता रहा... जब उसने एक नजर नीचे डाला तो, उसे कुछ ऐसा भ्रम हुआ... मानो नीचे दानों की, ही ढेरी लगी हो। चूजे के अभी तो पंख भी न थे, लेकिन उसने भ्रम में आकर लगा दी नीचे छलांग। और गिर पड़ा उस ईट,पत्थर और टहनियों के बीच। उसे गहरी चोट आई, जो उससे सहन न हुई। और भूख से तड़प-तड़प, त्याग दिया सदा के लिए प्राण। उड़ते उड़ते वो पक्षी दाना मुंह में ले कर आया। और जा बैठा उस डाल पर, जिस डाल पर, चूजे को छोड़ कर था गया। जब चूज़े को उसने लापता देखा, तो उसकी धड़कन बढ़ गई। इधर-उधर खूब तलाशा उसने अपने चूजे को, किंतु हर जगह से उसे निराशा ही बस हाथ लगी। फिर जा बैठा निचले डाल पर, करने लगा विलाप वो... जब डाली उसने एक नजर नीचे, एक पत्थर और टहनियों पर तो चूजे की एक झलक देख मन में उम्मीद की .... किरण जग उठी तब। झट से गया वो चूजे के पास विलाप कर-कर के कहने लगा... माफ करना मुझे.... मेरे वो प्यारे लाल। अब ना कभी बिछडूगा, आ गया हूं तेरे पास। अब तेरे पास ही में, सदा सदा रहूंगा। लेकिन चूजे ने तो... मूर्ति रूप धारण किया था। पंछी ने अपने लाल को बेप्राण जख्मी देखकर, जीवन से हार गया और चुन लिया मौत के कगार को।।


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