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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

जिंदगी के पन्ने

आनन्द सिंघनपुरी

ऐ जिंदगी! थोड़ा सब्र कर। मुझे तेरे दाम चुकाने हैं। पूरे न सही किस्तों में, थोडा कर,कुछ ज्यादा। ऐ जिंदगी ! मुझे मोहलत दे। सालों न सही कुछ दिन। आभासी अरमानों को सँजो कर रख सकूँ। ऐ जिंदगी ! थोड़ा ठहर जा। अंतर दग्ध व्यथाएं हैं न जाने लाखों संचित। तृषित उर में, मधुर गुंजार बना लूँ। ऐ जिंदगी! सुंदर सपन दे। जहाँ मैं एकांत नींदों के निलय में, सुखद मनोवृत, का चितेरे रंग भर सकूँ। ऐ जिंदगी! अधर पे गान दे। धड़कनों की ताल पे, पीरो संगीत, झंकृत कर सकूँ। ऐ जिंदगी! मधुरता की धार दे। चन्दन सी महक लिए, पूरे उपवन को , मधुमास बना महका सका हूँ। ऐ जिंदगी! अनुवादित, अधूरे प्यास की तृप्ति को 'आनंद'मग्न होने तक अंक सुला रस वर्षण कर मृदु आभास दे।


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