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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

रहस्यमय रिश्ता

सुशील शर्मा

मेरी पदस्थापना जिला से करीब 70 किलोमीटर दूर एक पर्वतीय स्थल जो कि बहुतदुर्गम क्षेत्र था में थी ,उस क्षेत्र में रहस्मयी कई किवदंतियां प्रचलित थी, जो कभी कभी मेरे मानसपटल पर दस्तक देतीं थी। एकदिन शाम को करीब सात बजे जिला स्तर से सन्देश मिला कि कल सुबह १० बजे एक अर्जेंट मीटिंग में मुझे उपस्थित होना है ,अब मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट था रात को कैसे जिला में पहुंचा जाए? मेरे पास कोई साधन था नहीं वहाँ से 30 किलोमीटर दूर मेरा एक दोस्त रहता था जिसके पास मोटर साइकिल थी । मैंने उससे संपर्क साधा और उसने मुझसे कहा की कैसे भी करके रात को तुम मेरे पास आ जाओ सुबह जल्दी से हम लोग जिला मीटिंग अटेंड करने चलेंगे।मैंने रात को करीब दस बजे अपने कार्यालय स्थल से अपने दोस्त के घर जो कि करीब 30 किलोमीटर था।मेरे पास कोई उपाय नही था अंततः मैंने जाने का फैसला लिया। रास्ते में बहुत घना जंगल था किन्तु नौकरी की दुश्वारियां मेरे आत्म विश्वास को नहीं डिगा पाईं मैंने कड़ा मन करके अपने दस्तावेज रखे और माँ का स्मरण करके निकल पड़ा।अंधेरे में रास्ता बहुत अनजान और रहस्यमयी लग रहा था। बड़े बड़े वृक्ष ,झाड़ झंकार ,,झींगुरों की आवाज़ें और बीच बीच में पक्षियों के फड़फड़ाने की आवाजें मन में सिहरन पैदा कर रहीं थीं। लेकिन मैं कड़ा मन करके अपने रास्ते पर बढ़ा जा रहा था।अचानक एक बहुत जोरदार दहाड़ से मैं आपाद मस्तक काँप उठा बाजू की झाड़ी में से एक विशालकाय आकृति निकल कर सामने खड़ी थी ।मेरे सामने एक बब्बर शेर खड़ा था गुर्राता हुआ धीरे धीरे मेरी और बढ़ रहा था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करूं ,मेरे हाथ से टॉर्च छूट गई थी और मैं करीब बेहोश होने की हालत में था।

हम दोनों के बीच में करीब पंद्रह फ़ीट का फासला था अचानक ,शेर मेरे ऊपर छलांग लगाने ही वाला था ,मैंने सोचा अब सब समाप्तलेकिन अचानक मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा एक धवल रंग कीआकृति मेरे और शेर के बीच में ज्योतिस्वरूप खड़ी हो गई। उस आकृति का कोईस्वरुप नहीं था जैसे सूर्य की कई किरणें मिलकर एक सरल रेखा की आकृति में ऊपर से नीचे की ओर खड़ी हो जाएँ ,उस ज्योतिपुंज को देख कर शेर जैसे भीगीबिल्ली बन गया और तुरंत उस जगह से भागा ,मैं अभी भी बेसुध सा उस ज्योतिपुंज को देख रहा था धीरे धीरे मेरे ऊपर बेहोशी छा गई और जब आँख खुली तो देखा मैं अपने दोस्त के घर पलंग पर लेटा हूँ।

"अरे मैं यहाँ कैसे आ गया " मैंने अपने दोस्त से पूछा।

मैं तो वहाँ जंगल में था..... वो शेर...... वो "मेरे मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी।

"अरे तुम्हे एक फारेस्ट ऑफिसर यहाँ छोड़ गए ,रास्ते में तुम उन्हें बेहोश पड़े मिले थे शायद चक्कर आ गया था तुम्हें उसी समय वो पेट्रोलिंग करते हुए शहर की और जा रहे थे। "मेरे दोस्त ने मुझ से कहा।

"लेकिन उन्हें कैसे मालूम की मुझे तुम्हारे पास आना है। "मेरे मन में अभी भी रात की एक एक घटना चलचित्र की भाँति चल रही थी।

"मैंने भी उनसे यही प्रश्न किया था उन्होंने कहा जहाँ तुम बेहोश हुए थेतो एक बुढ़िया जिसकी पास में ही झोपड़ी थी वह पास आ गई और वो तुम्हे उस झोपडी में प्राथमिक उपचार के लिए ले गए वही दस्तावेजों में मेरा पता उन्हें मिला और उस आधार पर वो तुम्हे मेरे घर छोड़ गए। "मेरे दोस्त ने विस्तार से मेरी जिज्ञासा को शांत किया।'

"और एक खुश खबरी जिला स्तर की बैठक अब केंसिल हो गई है रात को मुझे मेसेज मिला ,अब तुम आराम करो दोपहर में मैं तुम्हें वापिस गांव पहुंचा दूंगा।"मेरे दोस्त ने उत्साहपूर्वक ये खबर मुझे सुनाई।

मेरा मन अभी भी उथल पुथल से भरा था क्योंकि न तो मैंने अपने दोस्त का पता दस्तावेजों में रखा तथा न किसी को बताया था फिर उन्हें ये पता किसने दिया इसी उथल पुथल में दोपहर हो गई हम लोग भोजन करके वापिस गांव के लिए।रवाना हो गए ।

हम लोग उस जगह पर पहुंचे जहाँ ये घटना रात को घटित हुई थीवहां पर शेर के पांव के चिन्ह स्पष्ट देखे जा सकते थे ,साथ ही पास के खेतमें एक टूटी झोपडी भी थी जो बिलकुल सुनसान पड़ी थी जिज्ञासावस हम लोग उसझोपडी में पहुंचें तो देखा वहां पर कोई नहीं था। आसपास देखा दूर दूर तककिसी मनुष्य के रहने के कोई चिन्ह उस झोपड़ी में नहीं थें हाँ उस झोपड़ीमें घासफूस की दीवार पर एक माँ काली का बहुत पुराना कटा फटा चित्रबेतरतीव तरीके से लटका था ,मैंने अपने दोस्त की नजर बचा कर उस चित्र कोमोड़ कर अपनी जेब में रखा और चुपचाप घर वापिस आ गया।रात्रि को जब मैं बैठ कर दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहा था तो उस चित्र कोअपने सामने रखा और जैसे ही मैंने आँख बंद करके सप्तशती के श्लोक बोलनाशुरू किये अचानक वही ज्योतिपुंज उस चित्र में से निकल कर मेरे मानसपटल कोउद्दीप्त कर गया। मेरी आँखों से अविरल अश्रुधार बह रही थी ,माँ के प्रतिएक असीम स्नेह उमड़ रहा था जैसे एक शिशु अपनी माँ से मिलने को आतुर हो वहीभाव मेरे अंदर उद्वेलित हो रहे थे। मेरा और माँ का यह रहस्यमय रिश्ता कईजन्मों से कई जन्मों तक अविरल अक्षुण्य है।


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