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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

क्या सोचेंगे लोग

राजपाल सिंह गुलिया

सोच रहा हूँ बहुत देर से , क्या सोचेंगे लोग . बिठा रहे हैं ढुलमुल गोटी , लोग सियासी आज . बनी हुई हैं धर्म जातियाँ , कैसी तुनकमिजाज . निज हित में इक दूजे का ये, करने लगे प्रयोग . अंधकार से करे याचना , बिखरा हुआ उजास . बादल लौटे आज धरा की , छोड़ अधूरी प्यास . लेख लिखे हैं जो विधना ने , पड़ें भोगने भोग . संबंधों में हानि लाभ का , देखें ये अनुपात . राजा जी भी भोज परोसें , पूछ पूछ कर जात . पीर सुने जो आहत मन की , कहो कहाँ आयोग .


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