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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

है खुला सब कुछ

बृज राज किशोर 'राहगीर'

नेह के सम्बन्ध भी, अनुबन्ध हैं अब। एक घर में कुछ दिनों डेरा जमाना। वासना वाली नदी में नित नहाना। फिर किसी दिन ब्रेकअप की घोषणा कर, तोड़ रिश्ता इक नया साथी बनाना। है खुला सब कुछ, नहीं प्रतिबन्ध हैं अब। देह की आसक्ति को ही प्रेम बोलें। आपसी सम्बन्ध में बस सुख टटोलें। निज हितों की पूर्ति में संलग्न रहकर, जब करे मन तब नया अध्याय खोलें। और कहते हैं कि हम स्वच्छन्द हैं अब। अब नहीं अभिनय मनाने-रूठने का। एक क्षण को भय नहीं घर छूटने का। जब दिलों के तार जुड़ते ही नहीं तो, प्रश्न उठता है कहाँ दिल टूटने का। आपके हिस्से महज़ आनन्द हैं अब।


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