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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

बँटी हैं ज़मीनें

यूसुफ़ रईस

यहाँ से वहाँ तक वहाँ से यहाँ तक बँटी हैं ज़मीनें सू-ए-आसमाँ तक। मैं मिट्टी का घर था तभी बच गया हूँ वगरना न मिलता मेरा भी निशाँ तक। हमें अपने डर से भी लड़ना पड़ेगा यूँ ही ख़ौफ़ खायेंगे हम तुम कहाँ तक। मैं बरसों से ख़ुद में सफ़र कर रहा हूँ न पहुंचा कभी अपने ही दरमियां तक। यहाँ की वहाँ की बहुत बातें कर ली मगर वो न पहुंचे मेरी दास्ताँ तक । मुझे ज़िन्दगी ने वहाँ ला के छोड़ा फ़रिश्ते भी आते नहीं है जहाँ तक। जहाँ बर्फ़ बनके पिघल जाये हस्ती इबादत को ले चल उसी इम्तिहाँ तक।


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