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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 64, जुलाई(प्रथम), 2019

डरे हो तुम भी

यूसुफ़ रईस

यूँ जो ख़ामोश खड़े हो तुम भी मेरी मानिंद डरे हो तुम भी। अपने आँसू सुखा लिये तुमने यानि पत्थर के बने हो तुम भी। तुम भी तो राह भटक सकते हो इस नगर में तो नये हो तुम भी। ख़ुद में घुट घुट के जिया हूँ मैं भी और जी जी के मरे हो तुम भी। तुमको हर बात पता है लेकिन फिर भी ख़ामोश खड़े हो तुम भी। इक तो दिल भी नहीं है काबू में और दीवाना करे हो तुम भी।


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