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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



सडक रोती है

सरिता सुराणा


सङक रोती है 
रोज अपनी छाती पर 
ज़िन्दा लोगों के 
पुतले जलाते देखकर 
पुलिस की लाठी ,
गोली और खंजर से 
घायल लोगों की 
चीख - पुकार सुन - सुनकर 
अपने ऊपर पङी 
दुर्घटना के शिकार 
किसी निर्दोष की लाश के 
पास से गुजरते हुए 
संवेदनाहीन मनुष्यों को देखकर 
पूछती है अपने आप से 
क्या यही घोर कलियुग है ? 
जहां से शुरू हो गई है 
मानव सभ्यता के विकास की 
उल्टी गिनती और 
आदमी बन गया है 
कंक्रीट - सीमेंट 
चूना - पत्थर सम निर्जीव 
बिल्कुल एक बुत की तरह ? 

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