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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



किसान आत्महत्या

सरिता सुराना


भोर की पहली किरण के साथ
पलक झपकते ही , आंख खुलते ही 
सताने लगती है 
कम्बख्त यह पेट की आग 
जिसे बुझाने दौङ पङता है किसान 
हल , दरांती और फावङा लेकर 
दिन - भर हाङ तोङ मेहनत 
करने के बाद भी मिलती है 
जब साहूकार की लानत - मलानत
या बैंक से कुर्की के आदेश 
तब क्षुब्ध होकर कर लेता है 
वह आत्महत्या और फिर 
बैठायी जाती है उस पर 
सरकारी जांच कमेटी 
दी जाती है नेताओं द्वारा 
आश्वासनों की खुराक 
मगर उन्हें क्या मालुम 
पेट की आग कोरे आश्वासनों और 
भाषणों से नहीं बुझती 
उसके लिए चाहिए रोटी और 
रोटी अनाज से बनती है 
जो सरकारी गोदामों में पङा सङता है 
सबकी भूख मिटाने वाला अन्नदाता 
स्वयं भूखा मरता है और इसीलिए 
हर रोज एक किसान 
आत्महत्या करता है ।

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