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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



नशा

महेंद्र देवांगन


कुछ पी-पी के जी रहें हैं,कुछ जी-जी के पी रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी,सब पीये ही जा रहे हैं ।
नशे के अनेकों रंग है,नशे के अनेकों ढंग है ।
नशे के अनेकों पैतरे,नये-नये अपना रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
कुछ मद में ही मदमस्त हैं,कुछ पथ में ही पथ-भ्रष्ट हैं ।
कुछ आँखें दिखला रहें हैं,कुछ रास्ते बतला रहें हैं.।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
किसी को दौलत का नशा,किसी को ताकत का नशा ।
कुछ अन्न-कण जुटा रहें हैं,कुछ तो व्यर्थ लुटा रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
त्रिया को नशा सौंदर्य का,मदहोश भरी माधुर्य का ।
हँसकर पास बुला रहें हैं,प्रेम प्यार में फँसा रहे हैं.।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
नेता को मद नेतृत्व का,कर्ता को मद कर्तृत्व का ।
शाम-दाम अपना रहें हैं,अपना राज चला रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
भक्त को नशा है भक्ति का,अपने भगवन की शक्ति का ।
श्रद्धा सुमन चढ़ा रहें हैं,भक्ति अपनी दिखा रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
कवि को नशा है कवित्त का,रवि को नशा है निमित्त का ।
अपनी-अपनी सुर-ताल है,अपनें धुन में गा रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
जीवंत नशे को छोड़ के,जीवन से नाता तोड़ के ।
मयखाने महका रहें हैं,जीवन व्यर्थ गँवा रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...
अब तुच्छ नशे को छोड़ दो,जीवन को अपनें मोड़ दो ।
हम तो तुम्हें बता रहें हैं,पथ-प्रदर्शन करा रहें हैं ।
नशे से भरी है जिन्दगी, सब पीये ही...

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