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वर्ष: 1, अंक 16, जुलाई(प्रथम), 2017



हम-तुम

कंचन जायसवाल


तुम्हारे भीतर

मैं नहीं बहती.

कोई और

नदी बहती है.

मेरे भीतर

कीडे सा रेंगता है

तुम्हारा स्पर्श.

रीढ-विहीन.

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