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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

सायली*

ड़ा.नीना छिब्बर

1.
बच्चे हरदम हँसते नहीं जानते गम पानी जैसा मन ।।
2.
बच्चे पढ़ना लिखना सीखें चित्र देख पहचानें अक्षर स्वयं ।।
3.
बच्चे दूध मलाई कृष्ण की चतुराई यशोदा लला लीलाधारी ।।
4.
बच्चे लड़ते झगड़ते बातों बातों में पा लेते हल ।।
5.
बच्चे दो इन्हें किताब कलम दवात स्कूली शिक्षा आधार ।।
6.
बच्चे सुन कहानी पात्रों को मानें एकदम सच्चा जीवंत ।।
7.
बच्चे तुतलाती बोली अनगढ़ सी बातें इठलाएँ तब भी शैतान ।।
8.
बच्चे मासूम आँखें घूमती पुतलियां चमकदार सपने जिनमें हजार ।।
9.
बच्चे भविष्य हमारा हमें देना इनको सुंदर जलथल संभाल ।।
10.
बच्चे नहीं चाहते धूल धूआँ तूफान वो माँगे मैदान ।।
11.
बच्चे भूल जाते बड़ी बड़ी चोटें हम सीखें ज्ञान ।।
12.
बच्चे पकड़ हाथ रखें वो विश्वास हम देंगे साथ ।।
13.
बच्चे जो हैं अपनी दुनिया में रचे बसे मलंग।।
14.
बच्चे अमीरी गरीबी महल अटारी एक वो मानते समान ।।
15.
बच्चे कोमल बादल माँ का आँचल जहाँ मिले आराम।। * यह हायकू, ताँका, चौका जैसी जापानी काव्य विधा सायली है ।जिस में पहली पंक्ति में एक ,दूसरी में दो ,तीसरी में तीन,चौथी में दो व पाँचवी में एक शब्द आता है।

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