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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

रो के जिन्दगी जो गंवाते रहे

प्रीती श्रीवास्तव

रो के जिन्दगी जो गंवाते रहे। तो दुश्मन मेरे हंसते गाते रहे।। कहां हमने मानी कभी हार यूं। नये सपनें हम तो सजाते रहे।। वो मुश्किल थे हालात दौरे सफर। खुदा की कसम मुस्कुराते रहे।। होगी जीत या हार फिकर नही। खिलाड़ी नये हम लड़ाते रहे।। मेरे हाथ बाजी न आयी कभी। मगर दांव अक्सर लगाते रहे।। कोई गम नही कुछ गवाया नही। लुत्फ़ जिन्दगी का उठाते रहे।। मेरी बात रहबर सुनो तुम जरा। तुम्हें अपने दिल की सुनाते रहे।। बड़ी बेरहम है ये दुनिया दोस्त। रहे जीते औ दिल जलाते रहे।।

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