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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



एक दुशाला


नरेश गुर्जर


                    
एक दुशाला तेरे सजदे में दरगाह पर हम भी चढा आए है
तुझको मिले मोहब्बत तेरी ये दुअा पढ़कर आए है

तु जो अब किसी और का ही है हो चला
तेरे उस किसी और की खुशियों की ख्वाहिश रखकर आए है

क्योंकि वो खुश रहेगा तो खुश रहेगा तु
तेरी खुशियों की खातिर हम अपनी खुशियों का गला घोट आए

इस घुटन में ही गुजरेगी अब ये जिन्दगी हमारी
तेरी यादों का लिख दीवान हम अपने साथ लाए है

और जो तुझपें गुजरी वो तु जानें "नरेश"
वो क्या जानें जो लेकर उस के घर बारात आए है           
                 

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