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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

रहमतों की बरसात कभी तो होगी

आलोक कौशिक

बेबसी की आख़िरी रात कभी तो होगी रहमतों की बरसात कभी तो होगी जो खो गया था कभी राह-ए-सफ़र में उस राही से मुलाक़ात कभी तो होगी हो मुझ पर निगाह-ए-करम तेरी इबादत में ऐसी बात कभी तो होगी आऊंगा तेरी चौखट पे मेरे मालिक मेरे कदमों की बिसात कभी तो होगी लगेगा ना दिल तेरा कहीं मेरे बिना इन आंखों से करामात कभी तो होगी स्वीकार कर सके नाकामी अपनी हुक्मरानों की औक़ात कभी तो होगी ना कोई हिन्दू होगा ना मुसलमान इंसानों की एक जमात कभी तो होगी

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