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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

धैर्य मेरा खो रहा है

आकाश महेशपुरी

धैर्य मेरा खो रहा है हाय यह क्या हो रहा है लोग कहते कवि मुझे पर ज्ञान मेरा सो रहा है है हँसी में जिंदगानी किंतु मन यह रो रहा है सैकड़ों अवसाद कैसे यह कलेजा ढो रहा है मन सदा बेचैन होकर दर्द केवल बो रहा है कर नहीं पाया भले कुछ हौसला यूँ तो रहा है दाग़ गहरे मिट न पाते वक्त लेकिन धो रहा है अब नहीं "आकाश" आता साथ मेरे जो रहा है ग़ज़ल- आकाश महेशपुरी दिनांक- 08/01/2020

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