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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

मुझे ससम्मान विदा कर दो

महेश द्विवेदी

“मुन्नो, मुझे अब ससम्मान विदा कर दो”

श्रीमती सुशीला शर्मा अपनी बेटी नीरजा (मुन्नो) से अनुनय की मुद्रा में बोलीं थीं। मम्मी के मुख से ये शब्द सुनकर बेटी स्तब्ध रह गई थी। श्रीमती शर्मा दातागंज नामक कस्बे की रहने वाली थीं, जहां उनके गरिमामय व्यक्तित्व, न्यायप्रियता, दयालु स्वभाव तथा वैभव के कारण उनका बड़ा सम्मान था। दूर-दूर तक के ग्रामवासी पारिवारिक समस्या उत्पन्न होने पर अथवा किसी के द्वारा सताये जाने पर अपनी फरियाद लेकर उनके पास आते थे। उनके स्वर्गवासी पति अपनी मृत्यु के समय राज्य सरकार में सतर्कता निदेशक थे। तभी से वह मेम साहब के नाम से जानी जातीं थीं। स्थानीय प्रशासकीय अधिकारी मेम साहब की बात का सम्मान करते थे, अतः दूर दूर के ग्रामवासी भी उनके पास अपनी समस्या लेकर आते थे। समस्या ध्यान से सुनकर वह यथासम्भव सहायता कर देतीं थीं।

पांच वर्ष पूर्व मम्मी गम्भीर बीमार हो गईं थीं और इलाज के लिये मुन्नो के पास लखनऊ लाई गईं थीं। उन्हें फेफड़ों में क्रोनिक निमोनिया के कारण खांसी-बुखार, सोडियम-पोटैशियम की कमी के कारण बेहोशी और हर्पीज़ के कारण भयंकर सिरदर्द रहता था। गहन इलाज एवं मुन्नो की अहर्निश सेवा-सुश्रूषा के फलवरूप लगभग छः महीने के पश्चात मम्मी स्वस्थ हो पाईं थीं। वह पर्याप्त अशक्त हो गईं थीं और उसके पश्चात मुन्नो ने उन्हें अपने पास लखनऊ में ही रोक लिया था। मम्मी को सुश्रूषा की आवश्यकता थी और मुन्नो को सहर्ष सेवा की प्रवृत्ति थी। अतः दोनो में खूब अंतरंगता थी। ऐसे में मम्मी के मुख से चिरविदाई के ये शब्द सुनकर मुन्नो की आंखें अश्रुपूरित हो गईं थीं।

मम्मी आसन्न मृत्यु को जान चुकीं थीं और उन्होंने भोजन लगभग पूर्णतः त्याग दिया था, परन्तु मुन्नो का मन उनके अंत को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। अतः वह प्यार, मनुहार और ब्लैकमेल का हर हथकंडा अपनाकर उन्हें कुछ न कुछ खाने को बाध्य करतीं रहती थीं और वह आज़िज़ होकर मुन्नो के हाथ से कुछ न कुछ खा लेतीं थीं। फिर एक दिन मम्मी को सांस आने में कठिनाई होने लगी, तो मम्मी के प्रतिरोध के बावजूद मुन्नो ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया। इलाज के दौरान प्रतिदिन राइल्स-ट्यूब से खाने-पीने, अस्पताल के बेड पर मल-मूत्र विसर्जन करने, शरीर में जगह-जगह सुई भुकवाने तथा बेड-सोर की पीड़ा सहने से मम्मी के कष्ट बढ़ते रहे थे। उन असहनीय कष्टों का डाक्टर-नर्सों के सामने प्रकटीकरण मम्मी के आत्म-सम्मान पर गम्भीर आघात करता था और वह स्पष्ट बोल न पाने पर भी अंत समय तक सम्मानपूर्वक विदा कर दिये जाने हेतु अनुनय व आग्रह करतीं रहीं थीं। परंतु न तो उनकी बेटी और न दामाद उन्हें कुछ दिन पूर्व सम्मानपूर्वक विदा कर देने का साहस जुटा सके थे।

आज प्रायः उन्हें ग्लानि होती है कि मम्मी को एक–आध माह पहले सम्मानपूर्वक विदा न करके उन्होने मम्मी के प्रति ज़्यादती की थी और उन्हें अनावश्यक कष्ट सहने हेतु बाध्य किया था।

काश, हम सबने अंत समय निकट आने पर भोजन-पानी छोड़ देने की जैन मुनियों की परम्परा अपना ली होती!


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