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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

जीवन का द्वंद्व

जया पाण्डेय 'अन्जानी'

अतीत में अटके रहना जीवन के नियमों के विरुद्ध है। जीवित रहने के लिए आगे बढ़ते रहना पड़ता है, जैसे पृथ्वी बढ़ रही है, निरन्तर...। अगर पृथ्वी एक मिनट के लिए भी रुक जाए या विपरीत दिशा में मुड़ जाए तो यहाँ से जीवन का अस्तित्व समापन की ओर मुड़ जाएगा।

हम एक गतिमान ब्रह्मांड का गतिमान अंश हैं और स्थिरता मृत्यु का परिचायक। हम ब्रह्मांड की ऊर्जा हैं और ऊर्जा का स्वभाव केवल बहना होता है, रुकते ही ऊर्जा विनष्ट होने लगती हैं अर्थात हमारे भीतर से कहीं और प्रस्थान कर लेती है। जीवन के सभी द्वंद्व को सहन करके आगे बढ़ने और निरन्तर चलने का गुण ही मृत्यु को लाँघकर हमारे अस्तित्व को शाश्वत कर सकता है। अध्यात्म इसे ही मोक्ष कहता है, यानी वह भाव जब हम अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं, जब हम अच्छे बुरे के भेद से बाहर निकल जाते हैं।

जब कोई सहसा आकर कहता है दुनिया बहुत खराब है, हर तरफ बुराई फैली हुई है तो आप उनको बताते हैं कि बुरा हो रहा है तो अच्छा भी हो रहा है। लोग मर रहे हैं तो जी भी रहे हैं। लोग लड़ झगड़ रहे हैं फिरभी साथ ही रहे हैं। दो भाई एक दूसरे के शत्रु बने पड़े हैं लेकिन एक के साथ कोई दुर्घटना हो जाए तो वही भाई सबसे पहले दौड़कर उसके पास आता है। बहस के दौरान कोई अपने मित्र को कटुता भरे कितने ही शब्द कह डालता है लेकिन अगले ही क्षण उसे ग्लानि भी घेर लेती है और वह अपने ही कहे शब्दों से आहत होने लगता है। हम पर चाहे विपत्ति का पर्वत ही क्यूँ न टूट पड़े, हमारे किसी निकटवर्ती की सहसा मृत्यु ही क्यूँ न हो जाए, हमारे साथ कोई कितना भी बुरा क्यूँ ना करे, एक समय बाद हम अपने दुःख, क्रोध, पीड़ा और पश्चाताप से बाहर निकल ही जाते हैं और समय के साथ सारी घटनाएँ निष्प्रभावी हो जाती हैं।

इसी तरह जब हम अच्छे और बुरे की समतुल्यता को समझ लेते हैं तो सबकुछ सरल प्रतीत होता है। परिस्थितियों में विकार ढूंढने से परिस्थितियाँ जटिल प्रतीत होंगी ही। उतार-चढ़ाव के बीच सम्भलने के लिए साधन से ज़्यादा विश्वास आवश्यक है, आत्मविश्वास।

सन्देह करने वाला कभी सुखी नहीं रहता, ना ही सफल हो सकता है। दूसरों पर संदेह करना आपके भीतरी कमी को इंगित करती है। विश्वासी व्यक्ति ही दूसरों पर विश्वास कर सकता है। इसलिए आवश्यक है हम जो भी करें विश्वास के साथ करें।

समय की गति सबको बहाने का सामर्थ्य रखती है। चाहे वो कितना भी बड़ा शूरवीर हो। आख़िरकार सभी काल के द्वारा कुचले जाते हैं। लेकिन जो भावशून्य होकर ब्रह्म भाव में तटस्थ रहता है उसपर काल का भी प्रभाव नहीं पड़ता। जो शरीर मात्र में अपना अस्तित्व जान रहा था, वो शरीर के मृत होते ही नष्ट हो जाता है। लेकिन वो जो शरीर को मृत देखकर कष्ट का अनुभव कर रहा है वो कौन है? ये किसकी शांति के लिए प्रार्थनाएँ हो रही हैं? ये निढाल सा शरीर तो पहले ही शांत हो चुका है। फिर कौन है वो जो अशांत हुआ पड़ा है? कौन यहाँ से मुक्त हो गया है?

वो जो उसके भीतर विद्यमान था... वही तो वास्तविक अस्तित्व है। उसी अस्तित्व में टिकना और नश्वरता से अवगत होना ही मनुष्य योनि का लक्ष्य होना चाहिए।

कुछ समय के लिए भी रुककर मुड़कर पीछे देखना घातक हो सकता है। अतीत मनुष्य मन को बांधने की सम्पूर्ण क्षमता रखता है। लेकिन बुद्धि से बलवान मनुष्य उस जकड़न से निकल आते हैं। अतीत में फ़ँसा व्यक्ति स्वयं अतीत हो जाता है। 'भूत' सचमुच डरावना और अंधकारमय होता है, क्योंकि वह भूतकाल में फंसा हुआ है, वह इस सत्य से मुँह फेरता है कि भौतिक शरीर का काल समाप्त हो चुका है। अपने शरीर की मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। वर्तमान को बार बार अपने अस्तित्व की अनुभूति कराता है और जो इन अनुभूतियों को ग्रहण कर लेते हैं उन्हें भी वह अतीत के व्यूह में अटका लेता है। जिनको वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता वो सब अतीत के निवाले बन जाते हैं। हम स्मृतियों की तरंगों से आहत हुए बिना समय की नाव पर सवार रह सकते हैं यदि हमारे पास सत्य और ज्ञान की पतवार हो। फिर शरीर का काल समाप्त होते ही हमारे अस्तित्व की परिसीमा शरीर से मुक्त होकर ब्रह्मांड तक विस्तृत हो जाती है...

द्वेष राग में लिप्त मन कभी शाश्वत नहीं हो सकता

डार्विन के एक थ्योरी के अनुसार प्रकृति उनको स्वयं नष्ट कर देती है जो जीवन के लिए घातक होते हैं। जैसे थर्मोस्फीयर नामक वायुमण्डलीय परत धरती में किसी भी प्रकार के उल्का, उल्कापिंड आदि के प्रवेश को निषेध रखती है। उस परत के सम्पर्क में आते ही धरती में गिरने वाले एस्टेरॉयड और मेटेरॉइड नष्ट हो जाते हैं। यही शक्ति हमारे भीतर भी रोग प्रतिरोधक क्षमता के रूप में अधिष्ठित है जो सभी प्रकार के घातक जीवाणुओं से हमारी सुरक्षा करती है। हमारे शरीर में जब किसी भाग का ट्रांसप्लांट होता है तो सालभर तक अनेकानेक दवाइयों द्वारा शरीर को समझाना पड़ता है कि ये हमारे शरीर का ही भाग है, और आश्वासन दिलाना पड़ता है कि इसका व्यवहार हमारे शरीर के लिए मैत्रीपूर्ण होगा। तब कहीं जाकर शरीर उसे अपनाता है और सुरक्षा प्रदान करता है। कुछ ऐसा ही होता है हमारे भारतीय परिवारों के विवाह पद्धति में।

लव मैरिज और अरेंज मैरिज में सामंजस्य की भिन्नता देखने को मिलती है। जहाँ अरेंज मैरिज में विधि विधान से एक सदस्य घर में सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। वहीं लव मैरिज में सामाजिक विधि विधान के अभाव में खिन्नता, रोष और विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ जाता है, अंततः परिवार की पूरी प्रणाली ही बिगड़ जाती है। कभी-कभी एक समय बाद उस अवांछित सदस्य को अपना लिया जाता है और कभी-कभी वांछित सदस्य भी उपेक्षित रह जाता है।

ये जीवन एक अवसर मात्र है अपने अस्तित्व के विस्तार का अवसर। यह तभी सम्भव है जब हम संसार की हर वस्तु में अपना बिम्ब देख सकें। जब हम गुणों को आँकने के बजाए गुणों को समझने लगते हैं। जब हम जीव को नहीं, जीवन को देखने लगते हैं। तब सबकुछ समतुल्य जान पड़ता है।

जब सुख की इच्छा शेष नहीं रह जाती और दुःख की कोई अनुभूति नहीं होती। भौतिक वस्तुओं में सुख ढूंढना, फिर उनके अभाव में दुःख के राग अलापना, ये सब किसी लघु नाटिका सी प्रतीत होती है। माया के वशीभूत रहने वाले सत्य से अभिभूत नहीं हो पाते। यह जानना आवश्यक है कि स्वाद का प्रेमी स्वास्थ्य का शत्रु है। हम सहजता से सुख दुख, जीवन मरण के द्वंद्व से ऊपर उठ सकते हैं यदि हम भेदशून्य हो जाएं।

एक आम के पेड़ की लकड़ी है और एक जामुन की, दोनों को साथ रखा गया, साथ जलाया गया, वे ठोस रूप से गैस में परिवर्तित हुईं, फ़िर यह कौन भेद कर पाता है कि कौन-सा धुआँ आम की लकड़ी का है और कौन-सा जामुन की लकड़ी का? धुआँ होने के बाद तो सब एक जान पड़ते हैं...

समदृष्टि इसी समतुल्यता को उत्पन्न करती है और जब हम समभाव में होते हैं तब हमारे लिए सबकुछ सम्भव हो जाता है।


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